माँ पंचगव्य अनुसंधान केन्द्र के द्वारा भारतीय गोवंश की महत्ता को प्रचारित करने प्रयास किए जा रहे हैं। यहाँ इस बार भी गोवंश के गोबर, मिट्टी आदि को मिलाकर आकर्षक राखियां तैयार की जा रही हैं। राखियों के टूटकर गिरने पर यदि इसे किसी गमले आदि में डाला जाए तो उसमें से तुलसी का पौधा भी निकलेगा। राखी में उपयोग की गई सामग्री से पर्यावरण को किसी प्रकार का नुकसान नहीं होगा। यहां निर्मित राखियों को छत्तीसगढ़ के अलावा अनेकों महानगरों में भी भेजा गया है। अब तक पचास हजार राखियां छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य प्रदेशों में भेजी जा चुकी हैं।
अनुसंधान केन्द्र प्रभारी आर्य प्रमोद का कहना है कि देशी गोवंश का गोबर बहुत ही पवित्र हैlइसमें जीवाणुनाशक गुण हैं। यह एन्टी रेडिएशन का भी काम करता है। यही कारण है कि प्रत्येक पर्व त्योहारों में गोवंश की विशेष आवश्यकता सदियों से रही है। पर्व त्योहारों में बनाए जाने वाले मिष्ठान गोदुग्ध व गोघृत से ही बनता था। वहीं घर की सफाई लिपाई आदि गोबर, गोमूत्र से होती थी। बिना गोवंश के पर्व त्योहारों को मनाना नामुमकिन जैसा ही है। उन्होंने बताया कि आधुनिक दुनिया गोवंश से दूर होकर स्वयं भी अस्वस्थ और पर्यावरण को भी प्रदूषित करता जा रहा है। सभी धर्मों के पर्व त्योहार प्रायः प्रदूषणकारी हो चुके हैं।
