पहले रसायन के व्याख्याता थे फिर राज्य पुलिस सेवा में आए स्व.चौबे, वर्ष 1996 में बने आईपीएस
इस घटना में शहीद हुए स्व. वीके चौबे का जन्म 22 सितंबर 1959 में बिलासपुर में हुआ। वे वरिष्ठ पत्रकार द्वारिका प्रसाद चौबे के पुत्र थे। राज्य पुलिस सेवा में भर्ती होने से पहले उन्होंने बिलासपुर के सीएमडी महिला महाविद्यालय में रसायन शास्त्र के व्याख्याता के रूप में सेवाएं दी थी। 10 अप्रैल 1983 में अविभाजित मध्यप्रदेश की राज्य पुलिस सेवा में भर्ती हुए। अविभाजित एमपी एवं छग के विभिन्न स्थानों में सीएसपी एसडीओपी और एएसपी के पद पर कार्य किए। वर्ष 1996 में उन्हें राज्य पुलिस सेवा से भारतीय पुलिस सेवा में पदोन्नत किया गया।
वर्ष 2008 में राजनांदगांव में पदस्थापना के दौरान उन्होंने रायपुर, भिलाई के शहरों में नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को अपने कुशल नेतृत्व से ध्वस्त किए। 12 जुलाई 2009 को मानपुर के ग्राम कोरकोट्टी के पास एंबुश में नक्सलियों ने बारुदी सुरंग विस्फोट किया। नक्सलियों के साथ बहादुरी से लड़ते हुए उन्होंने वीरगति को प्राप्त किया। स्व.चौबे को वर्ष 2003 में विशिष्ट सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पदक और 2010 में वीरता के लिए मरणोपरांत कीर्तिचक्र से सम्मानित किया गया।
मैं एसपी साहब का ड्राइवर था, इसलिए मेरी भी शहादत की झूठी खबर घर वालों तक पहुंच गई थी
उस दिन डे शिफ्ट के ड्राइवर को चार्ज देने इंतजार कर ही रहा था कि एसपी चौबे साहब दफ्तर पहुंचे और मदनवाड़ा में दो जवानों के शहीद होने की खबर दी। मानपुर चलने कहा। फालो वाहन में राजू पीछे चल रहा था। एसपी साहब आसपास के थानों से मोटर साइकिल पार्टी निकालने का निर्देश देते गए।
चौकी की मोटर साइकिल पार्टी को क्रास कर हम आगे बढ़ते चले गए। साहब की गाड़ी और फालो वाहन रफ्तार के साथ आगे बढ़ रही थी कि कोरकोट्टी से डेढ़ किलोमीटर दूर फायरिंग शुरू हो गई। ड्राइवर राजू के कमर के पास गोली लगी। एसपी साहब ने एंबुश लगे होने की सूचना उच्चाधिकारियों को दी।
सीतागांव से एंटी लैंड माइंस व्हीकल मंगाया गया। एसपी साहब ने मानपुर से निकली मोटर साइकिल पार्टी का लोकेशन लिया तो पता चला कि वे आगे निकल गए हैं। एसपी साहब ने हालात को भांपते हुए वापस चलने की बात कही। गोली निकालकर लोकल डॉक्टर से इंजेक्शन लगवाए और राजू को बस में लिटा दिया।
स्वयं भी बस में सवार हुए पर रास्ते में नक्सलियों ने जगह-जगह पेड़ गिरा दिए थे। जवान पेड़ हटाने उतरते तो फायरिंग शुरू हो जाती। मुझे राजू को अस्पताल छोड़ने के बाद तत्काल लौटने कहा। मैं राजू को हॉस्पिटल लेकर आया फिर मौके पर एसपी साहब को लेने पहुंचा तो वहां लगातार फायरिंग चल रही थी।
आरआई साहब ने मुझे आवाज दी कि फायरिंग हो रही, आगे मत बढ़ो। मौके पर एसपी साहब का शव देखा। सड़क पर खून से लथपथ जवानों के शव पड़े थे। यहां तक मेरे घर में मेरी शहादत की खबर पहुंच गई थी, घर पर रिश्तेदारों की भीड़ जमा हो गई थी। दरअसल एसपी साहब के शहीद होने की खबर चलने के बाद परिजनों को लगा कि मैं भी नहीं रहा, पर मेरे लौटने के बाद परिजनों ने राहत की सांस ली कि मैं बच गया हूं।
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एंटी लैंडमाइन व्हीकल के भीतर थे, बाहर चल रही थी गोलियां
हमें जैसे ही नक्सल वारदात की जानकारी मिली, सीआरपीएफ के एंटी लैंड माइन व्हीकल में सवार होकर घटना स्थल के लिए रवाना हो गए। वाहन में ड्राइवर मिलाकर हम कुल 6 लोग थे। कुछ देर तक तो हमला सामान्य लग रहा था, लेकिन जैसे ही वाहन नजदीक पहुंचा, नक्सलियों ने हमें चारों ओर से घेर लिया। वाहन के टायरों पर भी गोलियां दाग दी।
अब एंटी लैंडमाइन व्हीकल पीछे करना भी मुश्किल हो रहा था, जिस हिस्से में मौजूद थे, वहीं फंसे रह गए। चारों ओर से नक्सली गोलियां चला रहे थे, हम भी व्हीकल के भीतर होल से जवाबी कार्रवाई कर रहे थे। उम्मीद नहीं थी कि हम भी बच पाएंगे। लेकिन हमने लड़ाई जारी रखी। पूरा इलाका गोलियों की आवाज से गूंज रहा था। सुबह 10 बजे से शाम 4.30 बजे तक हम एंटी लैंड माइन व्हीकल में ही फंसे रहे। जब पूरी लड़ाई शांत हुई तो समझ आया कि हम भी जिंदा हैं।
सप्ताह भर से जुट गए थे, मदनवाड़ा कैंप हटाना ही बड़ा मकसद था
तब मैं मानपुर डिवीजन कमेटी का सदस्य था। सप्ताह भर पहले से हम घटना के लिए जुट रहे थे। कंपनी नंबर 2 और 4 को हमले की जिम्मेदारी दी गई। मेरे हिसाब से हम 160 के आसपास थे। हमले की योजना मदनवाड़ा में बने पुलिस कैंप को हटाने की मकसद से बनाई गई थी।
हमें पता नहीं था एसपी साहब भी आ जाएंगे, लेकिन जो आएगा उस पर गोली चलाना है, ये जानते थे। ढाई से तीन महीने से मदनवाड़ा कैंप को हटाने अभियान चला रहे थे। कभी रास्ते काट रहे थे, तो कभी बिजली कनेक्शन। लेकिन इसके बाद भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।
इसलिए इस पूरे हमले की साजिश रची गई। घटना के बाद पुलिस ने इलाके में सक्रियता बढ़ा दी, अब हमें छिपने के लिए जगह भी नहीं मिलने लगी। पुलिस लगातार एनकाउंटर कर रही थी, इसके चलते मैं और मेरे करीब 30 साथियों ने धीरे-धीरे सरेंडर कर दिया।
