डोंगरगढ़ । नेहरू स्नातकोत्तर महाविद्यालय में अंतर्विभागीय अतिथि व्याख्यान का आयोजन किया गया। इसमें छ.ग. राज्य में स्वाधीनता आंदोलन विषय पर इतिहास विभाग की विभागाध्यक्ष डा.आशा चौधरी ने व्याख्यान दिया। अर्थशास्त्र एवं वाणिज्य विभाग के छात्र-छात्राओं को उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। भारत की आजादी में छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सन 1857 के पहले स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर 1947 की आजादी तक यहां भी अंग्रेजों के खिलाफ लगातार संघर्षों का दौर चलता रहा। आदिवासियों ने तो इससे पहले ही अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था।
सन 1818 में अबूझमाड़ इलाके में गैंद सिंह के नेतृत्व में आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहले विद्रोह का बिगुल फूंका था। लेकिन इस आंदोलन को स्वतंत्रता आंदोलन की शुरूआत नहीं माना जाता। 1857 से छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन का आगाज होता है। सोनखान के जमींदार शहीद वीरनारायण सिंह ने 1857 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का ऐलान किया था। उन्हें 10 दिसंबर 1857 को अंग्रेजों ने रायपुर के वर्तमान जय स्तंभ चौक पर फांसी दी थी। वीरनायारण को फांसी देने की बाद रायपुर केंद्रीय जेल परिसर में भी कहीं जाती है, इसे लेकर इतिहासकारों के बीच शुरुआत से मतभेद रहे हैं।
हनुमान सिंह ने अंग्रेजों को छकायाः
इसके बाद सन 1858 में रायपुर में फौजी छावनी (सैनिक) विद्रोह हुआ। वीरनारायण की शहादत ने ब्रिटिश शासन में कार्य कर रहे सैनिक हनुमान सिंह में विद्रोह का भाव जगा दिया। 1858 में उन्होंने अपने दो साथियों के साथ मिलकर ब्रिटिश हुकूमत के एक रेजीमेंट अधिकारी की हत्या कर दी थी। छह घंटे तक विद्रोही सैनिकों और ब्रटिश शासन के बीच संघर्ष चलता रहा, अंग्रेजी हुकूमत हनुमान सिंह को तो नहीं पकड़ पाई। लेकिन उनके 17 साथी सैनिकों को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें फांसी दे दी। हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना है कि अंग्रेजों ने वर्तमान पुलिस मैदान जो अंग्रेज शासन काल में छावनी था। वहां विद्रोही सैनिकों को तोप से उड़ा दिया था। इसके बाद 1910 में बस्तर का भूमकाल आंदोलन ने अंग्रेज शासन को हिला के रख दिया था।बस्तर में हुए भूमकाल आंदोलन अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध आदिवासियों का एक सबसे बड़ा सशस्त्र आंदोलन था। बस्तर में लाल कालेन्द्र सिंह और रानी सुमरन कुंवर ने अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ विद्रोह का ऐलान किया, इस विद्रोह का सेनापति गुण्डाधुर को चुना गया था। इन विद्रोहों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के अंदर देश में चल रहे अन्य कई आंदोलनों और सत्याग्रह का प्रभाव भी विशेष रूप से पड़ा था। खासतौर पर तिलक और गांधी जी का प्रभाव छत्तीसगढ़ के आंदोलन में विशेष रूप से रहा है। छत्तीसगढ़ में खास तौर पर 1920 में धमतरी का केंडल नहर.जल सत्याग्रह अहम रहा। धमतरी जिले के छोटे से गांव केंडल के किसानों ने अंग्रेजी शासन के तुगलकी फरमान के विरुद्ध जल सत्याग्रह किया था।इस सत्याग्रह से अभिभूत होकर गांधी जी 21 दिसंबर 1920 को धतमरी में किसानों के आंदोलन में शामिल होने पहुंचे थे। कार्यक्रम का संचालन डा.आरआर कोचे व आभार प्रदर्शन डा.ईव्ही रेवती ने किया।
