पटना. बिहार की राजधानी पटना फिर डूब गया. इस गुरुवार को पहली ही बारिश में शहर का हर कोना जलमग्न नजर आया. लोग अपने घरों से पानी उलीचते नजर आये. पुनाइचक में एक कार सवार को क्रेन से बचाना पड़ा. और तो और पानी राजधानी के सबसे व्यवस्थित इलाके में घुसकर राजभवन के दरवाजे तक पहुंच गया. शहर वासियों को एक बार फिर से पिछले साल के वो दिन याद आ गये जब तेज बारिश की वजह से तीन चौथाई पटना हफ्तों भीषण किस्म के जलजमाव का शिकार हुआ था और लोगों को कई दिनों तक क्रेन से बचाना पड़ा था. खुद राज्य के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को भी उनके घर से रेस्क्यू किया गया था.उस वक्त उत्पन्न शर्मनाथ स्थिति को देखकर सरकार ने जांच आयोग का गठन किया. जांच आयोग ने कुछ मझोले अधिकारियों और छोटे कर्मियों पर सारा दोष डाल दिया. सरकार ने उनपर कार्रवाई भी कर दी. फिर यह दावा भी कर दिया गया कि रोग के असली कारणों का पता चल गया है. इस बार ठीक इलाज होगा और पटना में किसी सूरत में जलजमाव नहीं होगा. पिछले दो महीने से, कोरोना और लॉक डाउन के बीच सरकार के ऐसे दावों की खबरें लगातार छप रही थीं. रोज नयी योजनाओं और तरकीबों के बारे में बताया जा रहा था. मगर जब बारिश हुई तो कोई योजना, कोई तरकीब काम नहीं आयी. तमाम सरकारी दावे धराशायी हो गये. अब हर कोई एक दूसरे से पूछ रहा है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ.
कहते हैं, आज से तकरीबन ढाई हजार साल पहले जब यह शहर बस रहा था, तब गौतम बुद्ध ने इसके बारे में भविष्यवाणी की थी कि इस शहर को आग, पानी और आंतरिक कलह से हमेशा खतरा बना रहेगा. आग का संकट तो अब दशकों से दिखायी नहीं देता, आंतरिक कलह भी बहुत अधिक नहीं है. मगर पानी का खतरा इस शहर के लिए नासूर बनता जा रहा है. शहर के राजेंद्र नगर और कंकड़बाग जैसे निचले इलाके हल्की बारिश में भी जलजमाव के शिकार होने के लिए अभिशप्त हैं. पिछले 25-20 साल से लगभग हर साल राजेंद्र नगर के इलाके में बारिश के दिनों में नाव चलने की खबरें सामने आती हैं. अवकाश प्राप्त अफसरों की कॉलोनी पाटलीपुत्रा का नाम भी इस सूची में जुड़ता जा रहा है.
वैसे तो आजकल हर बड़ा शहर बारिश के दौरान जलजमाव का शिकार हो रहा है. मगर जहां दूसरे बड़े शहरों में इस तरह की समस्या आबादी के बड़े बोझ, अनियंत्रित विकास और दूसरी टाली न जा सकने वाली मजबूरियों की वजह से है और वे इससे निबटने की भरपूर कोशिश भी करते हैं. मगर पटना शहर के जलप्लावन की सबसे बड़ी वजह यहां के सरकारी अमले का मिस-मैनेजमेंट है. यह बात कई जांच रिपोर्टों में सामने आयी है. अगर इस मिस-मैनेजमेंट को समझना है तो खुद पटना नगर निगम और बुडको द्वारा जारी उस सैकड़ों पन्ने के स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीज्योर(एसओपी) को पढ़ना चाहिए, जिसे हर साल मानसून से पहले जारी किया जाता है ताकि शहर को जलजमाव से बचाया जा सके.18 एजेंसियों को जिम्मेदारी दी जाती हैइस एसओपी में पटना को जलजमाव से बचाने के लिए कुल 18 एजेंसियों को जिम्मेदारी दी जाती है. हालांकि मुख्य जिम्मेदारी पटना नगर निगम और बुडको की रहती है. जहां बुडको की जिम्मेदारी शहर के 38 ड्रेनेज पंपिंग स्टेशनों (संप हाउस) का ठीक से संचालन करना होता है, ताकि बारिश में जमा पानी को नियमित और ससमय शहर से बाहर निकाला जा सके. वहीं, नगर निगम का काम नालों को सफाई और इस काम से संबंधित विभिन्न विभागों के साथ समन्वय रहता है. पिछले साल भी ऐसी ही एसओपी जारी हुई थी और दावा किया गया था कि सभी तैयारियां कर ली गयी हैं.
जाहिर सी बात है कि सरकारें गैरजिम्मेदार हैं और हमलोग लापरवाह. हमने खुद शहर से पानी के निकासी का रास्ता बंद कर दिया है और हर बारिश में जलजमाव का रोना रोते हैं. ऐसे में सिर्फ संप हाउसों के परिचालन और नालों की सफाई से पटना को डूबने से बचाया नहीं जा सकता. जब तक सरकार इन बड़े मसलों पर गंभीरता से नहीं सोचेगी. पटना शहर इसी तरह डूबता रहेगा.
