छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव की खैरागढ़ विधानसभा के लिए होने वाला उपचुनाव कई मायनो में खास है। 4 नवंबर 2021 को जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ यानि जोगी कांग्रेस के विधायक देवव्रत सिंह ने निधन हो जाने के बाद से यह सीट खाली है। खैरागढ़ विधानसभा के लिए 12 अप्रैल को मतदान और 16 अप्रैल को मतगणना होनी है। कांग्रेस, भाजपा, जोगी कांग्रेस समेत कई अन्य दल के प्रत्याशी भी इस चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे है.
उपचुनाव में कांग्रेस और भाजपा ने भले ही राजपरिवार के किसी सदस्य को उम्मीदवार नहीं बनाया हो, लेकिन पूरी चुनावी राजनीति राजपरिवार के इर्द-गिर्द ही घूम रही है। कांग्रेस जहां दावा कर रही है कि दिवंगत विधायक देवव्रत सिंह ने खुद के खून में कांग्रेसी डीएनए होने की बात कही थी,वही कांग्रेस से टिकट ना मिलने के बाद देवव्रत सिंह की पहली पत्नी पद्मा सिंह भी खुद में कांग्रेस का डीएनए होने की बात कहकर कांग्रेस का प्रचार करेंगी। वह अपने बच्चों के साथ घर-घर जाकर कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार करेंगी। तो भाजपा उनके अपमान को मुद्दा बना रही है।
कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला का कहना है कि पूर्व सीएम अजीत जोगी के निधन के बाद जब मरवाही उपचुनाव हुआ था। तब जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ने बीजेपी का समर्थन किया था। दिवंगत विधायक देवव्रत सिंह पहले कांग्रेस में थे ,फिर बाद में जोगी कांग्रेस ज्वाइन की ,उन्होंने भाजपा का प्रचार करने संबंधी अपनी पार्टी के इस फैसले का विरोध भी किया था।भूपेश बघेल सरकार के काम से भाजपा मुद्दाविहीन हो गई है। भाजपा के सभी बड़े नेताओं की नींद हराम हो गई है, इसलिए उन्हें हर वक्त घबराहट हो रही है।
वहीं भाजपा प्रवक्ता और पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने ट्वीट में लिखा है कि – देवव्रत सिंह को छत्तीसगढ़ के वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व ने बहुत अपमानित किया था, इसलिए उनको कांग्रेस छोड़नी पड़ी थी, खैरागढ़ की जनता अपने राजा का अपमान कभी भी नहीं भूलेगी।
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Ajay Chandrakar@Chandrakar_Ajayस्व. देवव्रत जी, पूर्व विधायक खैरागढ़ छत्तीसगढ़ को, छत्तीसगढ़ के वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व ने बहुत अपमानित किया था, इसलिए उनको कांग्रेस छोड़नी पड़ी थी… खैरागढ़ की जनता अपने स्व. राजा का अपमान कभी भी नहीं भूलेगी। @bhupeshbaghel@INCChhattisgarh@plpunia@BJP4CGState
खैरागढ़ राजघराने का अस्तित्व
खैरागढ़ रियासत के विधानसभा बनने तक के सफर के बीच आजादी के पहले से इस स्थान पर राजघराने का ही राजनीतिक दबदबा कायम रहा है। खैरागढ़ में हुए विधानसभा चुनावों हमेशा ही जीत का सेहरा राजघराने के वारिसों के सिर पर ही बंधा है। एक जमाने में पूर्व पीएम राजीव गांधी के क्लासमेट रहे राजा शिवेंद्र बहादुर सिंह राजनांदगांव से सांसद थे। देवव्रत सिंह शिवेंद्र बहादुर सिंह के भतीजे थे। खैरागढ़ रियासत के विधानसभा बनने तक के सफर के बीच आजादी के पहले से इस स्थान पर राजघराने का ही राजनीतिक दबदबा कायम रहा है। खैरागढ़ में हुए विधानसभा चुनावों हमेशा ही जीत का सेहरा राजघराने के वारिसों के सिर पर ही बंधा है। एक जमाने में पूर्व पीएम राजीव गांधी के क्लासमेट रहे राजा शिवेंद्र बहादुर सिंह राजनांदगांव से सांसद थे। देवव्रत सिंह शिवेंद्र बहादुर सिंह के भतीजे थे। देवव्रत सिंह की मौत के बाद अब यह सवाल भी उठ रहा है कि भाजपा या कांग्रेस खैरागढ़ राजघराने से जुड़े किसी व्यक्ति को टिकट नहीं दिया है, इससे इस सीट से किसी नए व्यक्ति के राजनीतिक उदय होने के साथ खैरागढ़ राजपरिवार की दखल खत्म हो सकती है।
रमन,भूपेश की प्रतिष्ठा लगी है दांव पर
खैरागढ़ में होने वाला उपचुनाव ना केवल वहां से नामांकन दाखिल करने वाले प्रत्याशी लड़ेंगे, बल्कि छत्तीसगढ़ के मौजूदा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी लड़ेंगे, यानी इस चुनाव में दोनों नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। इसकी वजह भी बेहद ही साफ है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद हुए चित्रकोट, मरवाही और दंतेवाड़ा उपचुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल की है। माना जाता है कि यह जीत मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कि अगुवाई में ही मिली है। जाहिर सी बात है छत्तीसगढ़ में टीम भूपेश बघेल अपनी जीत का सिलसिला जारी रखना चाहेगी।
वहीं खैरागढ़ रियासत जो राजनांदगांव जिले में आती है, उस राजनांदगांव सीट से पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह विधायक हैं। इतनी ही नहीं खैरागढ़ से लगा हुआ कवर्धा भी डॉ. रमन सिंह का गृह नगर होने के नाते उनके प्रभाव वाला क्षेत्र है, लिहाजा खैरागढ़ उपचुनाव को छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम और मौजूदा सीएम के बीच की जंग के तौर पर देखा जा रहा है.
कांग्रेस ने मंत्री रविंद्र चौबे और कवासी लखमा को कमान सौंपी है। इनके साथ संगठन के नेताओं को भी जिम्मेदारी दी गई है। वहीं भाजपा ने पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, राजेश मूणत और केदार कश्यप को मंडल स्तर पर चुनावी मैनेजमेंट सिद्ध करने का जिम्मा सौंपा है। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक, विधायक शिवतरन शर्मा भी एक-एक मंडल के प्रभारी बनाए गए हैं। इस पूरी रणनीति के पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि कांग्रेस को उपचुनाव जीत के अपने रथ को आगे बढ़ाना है। वहीं भाजपा को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की जीत के बाद उत्साहित कार्यकर्ताओं के मनोबल को बचाना है। उपचुनाव मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कांग्रेस सरकार के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है। देश में कांग्रेस की सबसे मजबूत सरकार छत्तीसगढ़ में है। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार रहे गिरवर जंघेल को करीब 30 हजार मतों से हार का सामना करना पड़ा था। ऐसे में कांग्रेस को मतों के अंतर की खाई को पाटते हुए चुनाव जीतने की चुनौती है। वहीं भाजपा ने मंडल स्तर पर पांच दिग्गजों को जिम्मेदारी दी है। मंत्री रविंद्र चौबे दुर्ग संभाग से आते हैं। मुख्यमंत्री बघेल का भी चौबे पर भरोसा है। हमेशा वह संकटमोचक की भूमिका में नजर आते रहे हैं। वहीं आदिवासी वोटरों पर प्रभाव डालने के लिए मंत्री कवासी लखमा को प्रभारी बनाया गया है।
भाजपा पांच मंडल में एक-एक वरिष्ठ नेता को जिम्मेदारी देकर पार्टी उनके चुनावी मैनेजमेंट को परखना चाहती है। मूणत और कश्यप को अपनी दमदार वापसी के लिए प्रभार क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार को बढ़त दिलाना है। वहीं भाजपा की राजनीति में अपने प्रभाव को मजबूत करने के लिए नेता प्रतिपक्ष कौशिक और पूर्व मंत्री अग्रवाल को भी अपने प्रभार क्षेत्र में बढ़त दिलाना होगा। भाजपा ने लोधी बाहुल क्षेत्र में हर वर्ग के एक-एक नेताओं को वोटरों को साधने का जिम्मा दिया है। सूत्रों की मानें तो केंद्रीय संगठन पांचों नेताओं के प्रभार क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार को मिले मतों का अध्ययन करेगा और भविष्य में इन नेताओं की क्षमता का आकलन भी होगा।
वर्ष 2018 के चुनाव में इस तरह हुआ मतदान
2018- कुल मतदान – 84.59 प्रतिशत
प्रत्याशी प्राप्त मत मतों का प्रतिशत
देवव्रत सिंह जकांछ 61,516 36.08
कोमल जंघेल भाजपा 60,646 35.57
