छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर विकास प्राधिकरण (एनआरडीए) की 2.659 हेक्टेयर भूमि पर बने रिटेल कांप्लेक्स के कर्ज का भुगतान नहीं करने के कारण यूनियन बैंक ने उसे कब्जे में ले लिया है। इससे पक्ष-विपक्ष के बीच नया विवाद खड़ा हो गया है। दोनों पक्ष इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार का आर्थिक कुप्रबंधन इसी तरह जारी रहा तो विधानसभा व मंत्रालय भवन के साथ-
दूसरी ओर सत्तापक्ष आरोप लगा रहा है कि इसके लिए प्रदेश की पिछली भाजपा सरकार ही जिम्मेदार है, क्योंकि उसी के कार्यकाल में मांग का आकलन और सर्वेक्षण किए बिना ही यूनियन बैंक के पास जमीन गिरवी रखकर करोड़ों रुपये का लोन लिया गया था। यद्यपि यह तो सियासतदानों की अपनी गर्दन बचाने के लिए राजनीतिक बयानबाजी हो सकती है, लेकिन सच्चाई यही है कि इसमें प्रदेश की जनता की गाढ़ी कमाई फंस रही है। जिम्मेदार कोई भी हो, लेकिन इसमें धोखा जनता के साथ ही हुआ है, क्योंकि आखिरकार उससे वसूले जाने वाले राजस्व से ही राज्य का अर्थतंत्र संचालित होता है।
यह मामला तो एक उदाहरण मात्र है। नवा रायपुर में हजारों करोड़ रुपये के विकास कार्य किए जा रहे हैं। यह अच्छी बात है। विकास किसी भी राज्य के लिए जरूरी है, लेकिन यहां कर्ज लेकर खर्च किया जा रहा रुपया सरकार निकाल नहीं पा रही है। यह प्रतिबद्धता, नीति और नीयत से जुड़ा मामला है। कर्ज है कि बढ़ता ही जा रहा है। पिछले महीने विधानसभा में सरकार ने खुद बताया था कि कर्ज के एवज में हर माह 430 करोड़ रुपये का ब्याज चुकाना पड़ रहा है। दिसंबर, 2018 से अक्टूबर 2021 के बीच बीते 43 महीनों में ही प्रदेश सरकार 51 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज ले चुकी है।
दरअसल नवा रायपुर में बसाहट की धीमी गति कई सवाल खड़े कर रही है। सरकार और विकास कार्यों को दिशा देने वाले अधिकारियों की दूरदश्रिता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। वजह अगर वहां जमीन और मकान की कीमत अधिक होने की है तो इस पर नए सिरे से विचार किया जाना चाहिए। बिना बसाहट नवा रायपुर भला किस काम का होगा? लोग बसेंगे, तभी वहां का अर्थतंत्र दौड़ेगा, तभी विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। किसी भी योजना की रूपरेखा तय किए जाते समय हानि-लाभ का सही आकलन कर सरकार को बताना और समय सीमा में कार्यान्वयन अधिकारियों का कर्तव्य है। ऐसा नहीं करने से प्रत्यक्ष रूप से भले ही सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता हो, लेकिन वास्तव में उसके भुगतान की जिम्मेदारी जनता ही उठाती है। समझना और स्वीकार करना होगा कि संतुलित विकास पूरे सरकारी तंत्र की कर्तव्य है। इसमें किसी प्रकार की सियासत को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
