राजनांदगांव नौ जनवरी। जैन मुनि सम्यक रतन सागर जी ने आज यहां कहा कि जब हमें देखने और सोचने की शक्ति मिली है तो इसका सही उपयोग होना चाहिए। चील के पास दृष्टि होती है किंतु दृष्टिकोण नहीं होता इसलिए इतनी ऊंचाई में उड़ने के बाद भी उसकी नजर नीचे की ओर रहती है, वह शव, गला मांस आदि खोजते रहता है। हमारी भी दृष्टि एवं दृष्टिकोण सही नहीं हुआ तो हमारा पतन निश्चित है।
मुनिश्री ने कहा कि दृष्टि की एक निश्चित सीमा होती है किंतु दृष्टिकोण की सीमाएं अनंत है। दृष्टि में हम एक निश्चित दूरी तक परिवर्तन कर सकते हैं किंतु दृष्टिकोण में हम शुरू से लेकर अंत तक परिवर्तन कर सकते हैं। जैन जगत का आध्यात्म भी दर्शन यानि दृष्टिकोण पर टिका है। उन्होंने कहा कि हम आराधना साधना के कितने भी उड़ान भर लें किंतु यदि दृष्टिकोण मलिन है तो हमारी साधना-आराधना का कोई मतलब नहीं। उन्होंने कहा कि आकाश में उड़ने वाले चील की नजर अर्थात दृष्टि इतनी ऊंचाई में होने के बाद भी नीचे रहती है क्योंकि चील के पास दृष्टि है किंतु दृष्टिकोण नहीं है। हंस के पास दृष्टि भी होती है और दृष्टिकोण भी होता है इसीलिए वह दूध और पानी को अलग अलग कर देता है।
मुनि श्री ने कहा कि सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान एवं सम्यक चारित्र्य यह मोक्ष के मार्ग है, यही हमें आत्म सुख दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि दृष्टिकोण पहले बदलना चाहिए तभी हम परमात्मा के तत्व को प्राप्त कर सकते हैं। परिवर्तन संसार का नियम है। कोरोना वायरस जैसा सूक्ष्म जीव भी एक जगह नहीं ठहरता। उन्होंने कहा कि हमें गुणों का अभाव खटकना चाहिए तभी हम अनंत यात्रा की सुख को प्राप्त कर सकते हैं, तभी हम अपना आत्म विकास कर सकते हैं।
शिकायत करने वाला कभी प्रसन्न नहीं हो सकता * प्रवीण मुनि
श्रमण संघ के उपाध्याय प्रवीण मुनि ने कहा कि शिकायत करने वाला कभी प्रसन्न नहीं हो सकता। शिकायत एक कांटा है और इससे हमें बचना चाहिए। शिकायतकर्ता कभी धर्म श्रद्धालु हो नहीं सकता। उन्होंने कहा कि जिसके पास बुद्धि का दिया है वह कभी शिकायत नहीं करता और जिसका दिवाला निकल गया है ,वहीं शिकायत करता है।
श्रमण संघ के उपाध्याय प्रवीण मुनि आज यहां जैन बगीचे में बोल रहे थे।उन्होंने कहा कि जीवन में धर्म पर श्रद्धा हो जाए तो उसे हम कैसे समझें और इसका परिणाम क्या आना चाहिए? उन्होंने स्वयं ही इसका जवाब देते हुए कहा कि साता और सुख के प्रति विरक्ति ही धर्म के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होने का भाव है। जिनके मन में धर्म श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है, वह श्रद्धा व त्याग के आधार पर ही चलता है। श्रद्धा और ज्ञान इस लोक में तो साथ रहते ही हैं परलोक में भी यह साथ में रहते हैं। उन्होंने कहा कि चारित्र्य का साथ केवल इसी भव में रहता है। उन्होंने कहा कि रिश्ते में शिकायत नहीं होनी चाहिए और यदि शिकायत या भोग रिश्ते में आ जाता है तो प्राण प्यारी भी प्राण प्यासी बन जाती है। आपका यदि श्रद्धा का रिश्ता है तो शिकायत की जगह हो ही नहीं सकती। श्रद्धा के साथ स्वयं की राह पर चलने के बाद शिकायत को अपने से दूर कर दे शिकायत करने वाला व्यक्ति कभी प्रसन्न नहीं रह सकता। उन्होंने कहा कि हम शिकायत नहीं करते लेकिन करेक्शन कर सकते हैं। गलती में सुधार होनी ही चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि कोई भी बात बोलने या सुनने के लिए नहीं होनी चाहिए बल्कि बात मंजिल तक पहुंचनी चाहिए। शिकायत एक कांटा है और इससे बचें। उन्होंने पूछा कि क्या आप अपने आपको ही काटा चुभायेंगे,नहीं न! कैकई ने एक बार दशरथ को कांटा चुभाया तो उसको पूरा जीवन कांटे ही कांटे से भर गया। उन्होंने कहा कि रिश्ते सुधारने के लिए हमें शिकायत से दूर रहना चाहिए।हम शिकायत जितनी करेंगे उतने ही हम धर्म से भी दूर होते जाएंगे। शिकायत नहीं है तो नवकार मंत्र सिद्ध है आप अपने धर्म, मंत्र एवं दर्शन को सिद्ध करना चाहते हैं तो आप शिकायत से दूर रहें।
