रायपुर। सेवा और सहयोग के नाम पर मतांतरण की साजिशों के कारण प्रदेश की जनसंख्यात्मक संरचना लगातार बदल रही है। वनाच्छादित क्षेत्रों में आदिवासियों को लोभ-लालच से भ्रमित करने के खेल लंबे समय से चल रहे हैं। इनका विभिन्न संगठनों द्वारा विरोध भी किया जाता रहा है, परंतु अज्ञात अंतरराष्ट्रीय संरक्षण के कारण कारगर तरीके से नियंत्रण संभव नहीं हो पा रहा है। मतांतरण विरोधियों की तरफ से यह आरोप लगता रहा है कि छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड में ईसाई मिशनरियों का लक्ष्य सेवा के नाम पर मतांतरण कराना है।
इसी तरह सुदूर गांवों में घुसपैठिए मुसलमानों के भी मजदूरी के नाम पर पहुंचने और आबादी की संरचना को बदलने नाम बदलकर वैवाहिक रिश्ते स्थापित करने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। इन वजहों से प्रदेश में ईसाइयों की आबादी पांच लाख से ऊपर जा चुकी है। इसमें समाज को तोड़ने वाली ताकतों का बड़ा योगदान है, जो विभिन्न मौकों पर आदिवासियों के हिंदू होने पर सवाल खड़े करती हैं और दूसरी तरफ से मतांतरण में सक्रिय लोगों को अपने कुप्रयासों को साकार करने का मौका मिल जाता है।
राजधानी रायपुर के निकट विकसित हो रहे नवा रायपुर में मध्य प्रदेश के मंडला जिले से अवैध रूप से लाकर रखे गए 19 बच्चों को बाइबिल की शिक्षा देने वाले प्रचारक नरेश महानंद के खिलाफ कार्रवाई गांव के लोगों की जागरूकता से ही संभव हो पाई है। मतांतरण के लिए अब बालगृह के इस्तेमाल किए जाने से अब खतरे की घंटी बज चुकी है। समाज सेवा के नाम पर लोगों से चंदा एकत्रित करने की प्रक्रिया को अपनाया जाना तो मात्र छलावा था, परंतु स्थानीय लोगों ने सजगता दिखाते हुए प्रशासनिक अधिकारियों को तुरंत सूचित कर मात्र बीस दिनों के अंदर ही खेल पर विराम लगाने में अहम भूमिका निभाई है।
दुखद पक्ष यह भी है कि मंडला से ही बीस और बच्चों को तेलंगाना में इसी तरह के एक बालगृह में ही रखा गया था। इस तरह स्थापित हो रहा है कि संगठित तरीके से मतांतरण का काम चल रहा है और जन जागरूकता से ही ऐसे लोगों पर कार्रवाई हो पा रही है। इसकी गहन जांच की जानी चाहिए कि संस्था चलाने के लिए धन की व्यवस्था कहां से हो रही थी और मतांतरण के इस काम में अवैध रूप से सहयोग करने वालों को भी कार्रवाई की जद में लाया जाना चाहिए।
बच्चों को अवैध रूप से मध्य प्रदेश से रायपुर लाया जाना मानव तस्करी का भी मामला है। आठ से दस साल के लड़कों और लड़कियों को एक ही कमरे में जमीन पर सुलाया जाना और समुचित भोजन नहीं दिया जाना, उनके साथ अमानवीयता भी है। बालगृह का यह मामला मतांतरण की साजिशों का सिर्फ उदाहरण है। समाज को जागरूक होकर ऐसे लोगों को बेनकाब करने के लिए सक्रिय भागीदारी करनी होगी। साथ ही सरकार और प्रशासन को भी बिना किसी दवाब में आए पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ मतांतरण के रैकट से जुड़े सभी लोगों को सलाखों के पीछे भेजना होगा।
