कोरोना संक्रमण का दौर बीता नहीं है। विशेषज्ञ तीसरी लहर की आशंका जता रहे हैं। महामारी के दौर में लोगों को ऑक्सीजन के लिए तड़पते सबने देखा है। इसके बाद भी छत्तीसगढ़ के बालोद में कुदरत के ऑक्सीजन सिलेंडर पर विकास की आरी चलने को तैयार है। तरौद दैहान प्रोजक्ट के तहत 8 किमी की सड़क बनाने के लिए 2 हजार पेड़ काटे जाने हैं। इसे देखते हुए पर्यावरण प्रेमियों ने विरोध में ‘चिपको आंदोलन’ शुरू कर दिया है।

कुछ इस तरह से पेड़ से लिपटकर उसे कटने से बचाने के लिए पर्यावरण प्रेमी प्रयास कर रहे हैं।
दरअसल, जिले के तरौद दैहान बाईपास के दोनों ओर 2 हजार पेड़ लगे हुए हैं। बताया जा रहा है कि अब इस बाईपास को 10 मीटर चौड़ा कर करीब 8 किमी तक कंक्रीट की सड़क बनाने की योजना है। इस सड़क को नेशनल हाईवे-930 से जोड़ेंगे। करीब 40 करोड़ रुपए खर्च कर बनाई जाने वाली इस सड़क के लिए वहां लगे पेड़ों को काटा जाएगा। खास बात यह है कि सड़क के दोनों ओर की जमीन वन विभाग की है।
पेड़ों को बचाने के लिए उससे लिपटे पर्यावरण प्रेमी, बांधेंगे राखी
बाईपास निर्माण के लिए पेड़ों को कटने से बचाने के लिए पर्यावरण प्रेमी उससे लिपट कर विरोध जता रहे हैं। ग्रीन कमांडो वीरेंद्र सिंह सहित अन्य पर्यावरण प्रेमियों ने एक और चिपको आंदोलन शुरू कर दिया है। वह पेड़ों से लिपटकर उसे न काटने देने का संकल्प ले रहे हैं। वीरेंद्र सिंह ने कहा कि सड़क निर्माण के लिए जंगल की बलि नहीं देने देंगे। हमें जीने के लिए शुद्ध हवा चाहिए। उन्होंने बताया कि आने वाले समय में महिलाएं और बहनें पेड़ों को राखी बांधेगी।
बालोद कलेक्टर से शिकायत, लेकिन जवाब नहीं मिला
ग्रीन कमांडो वीरेंद्र सिंह और पर्यावरण एक्टिविस्ट बताते हैं कि उन्होंने इस सड़क निर्माण को रोकने के लिए बालोद कलेक्टर के सामने भी अपनी मांग रखी थी। इतने पेड़ काट दिए जाएंगे तो पर्यावरण पर काफी बुरा असर पड़ेगा। इन पेड़ों को काटने की एवज में दूसरे पौधे कहां-कहां लगाए जाएंगे, इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी जा रही है। साथ ही यह भी कहा अगर सड़क बनाना जरूरी है तो पेड़ों को काटने की जगह उसे ट्रांसप्लांट करें।
उत्तराखंड के वनों की सुरक्षा के लिए चला था चिपको आंदोलन
चिपको आंदोलन उत्तराखंड के वनों की सुरक्षा के लिए वहां के लोगों ने 1970 के दशक में शुरू किया था। इसमें लोगों ने पेड़ों को गले लगा लिया ताकि उन्हें कोई काट न सके। आंदोलन का केंद्र चमोली का रेनी गांव था। वन विभाग ने क्षेत्र में लगे 2451 पेड़ साइमंड कंपनी को ठेके पर दे दिए थे। जानकारी मिलने पर गांव वालों ने विरोध किया। यह देख सरकार ने आंदोलनकारियों को बातचीत के लिए बुला लिया। इस बीच ठेकेदार और वन अधिकारी जंगल में घुस गए। तब गांव में मौजूद महिलाओं ने गौरादेवी के नेतृत्व में आंदोलन शुरू कर दिया।
