राजनांदगांव । सालभर पहले इसी मार्च के महीने में कोरोना ने दस्तक दी थी। कोरोना महामारी का ऐसा प्रभाव पड़ा कि यातायात सेवाएं बंद पड़ गई। रेल व यात्री बसें रुक गई थीं। लाकडाउन होने से सड़कें भी सूनी थीं। ऐसे संकट के समय में प्रवासी श्रमिकों को मीलों तक पैदल भी सफर करना पड़ा। ट्रक और मालवाहक में बैठकर प्रवासी श्रमिक अपने घर व गांव लौटे थे। आज भी जब प्रवासी श्रमिक लाकडाउन और कोरोना के कहर को याद करते हैं तो उनकी आंखें नम हो जाती है। कोरोना काल में भले ही विकास कार्यों को गति मिली हो, लेकिन श्रमिकों को कोरोना ने जमकर परेशान किया। पूरे लाकडाउन में जिले की सीमा बागनदी पर मेले जैसा माहौल था। रेल व बस सेवाएं बंद होने से श्रमिक खतरा मोल लेकर मालवाहकों में सफर किए। महामारी के चक्कर में बार्डर पर एक-दो श्रमिकों ने अपनी जान भी गंवाई। वर्तमान में कोरोना फिर लौट आया है। संक्रमण के फैलाव को देखते हुए आम लोगों के साथ प्रवासी श्रमिकों की दहशत फिर बढ़ गई है।
‘अमृत’ का हुआ विकास ढाई महीने के लाकडाउन में विकास कार्यो की गति जरूर मिली। हालांकि कई विकास कार्यों के लिए श्रमिक नहीं मिले, लेकिन जिला मुख्यालय में निर्माणाधीन अमृत मिशन के प्रोजेक्ट को लाकडाउन में भी गति मिली। स्थानीय श्रमिकों को लेकर प्रशासन ने अमृत मिशन का काम कराया। नतीजा यह हुआ कि आठ माह पीछे हुआ अमृत मिशन के काम ने लाकडाउन में रफ्तार पकड़ी और दो माह की वर्किंग को कव्हर किया। वर्तमान में अमृत मिशन का प्रोजेक्ट अपनी डेडलाइन से छह माह पीछे चल रहा है। इस गर्मी में भी अमृत मिशन के तहत शहर के लोगों को पेयजल नहीं मिलेगा।
गांव में ही मिला था रोजगार संकट के समय जैसे-तैसे कर दूसरे राज्यों में पलायन करने वाले जिले के ग्रामीण अपने गांव लौटे। राज्य सरकार ने हर गांव में मनरेगा योजना के तहत काम शुरू किया। लाकडाउन के दौरान जिले में करीब 46 हजार 834 श्रमिक वापस लौटे थे, जिसमें से 27958 मजदूरों को गांव में ही मनरेगा में रोजगार दिया गया। इनमें से 14668 श्रमिकों को नया जाब कार्ड भी दिया गया। कोरोना काल में जिले में सबसे ज्यादा मनरेगा का काम पूरा किया गया। मनरेगा के कार्यों में छग के सभी जिलों में राजनांदगांव जिला सबसे अव्वल भी रहा। वर्तमान में लौटे श्रमिकों में आधे से ज्यादा लोग दोबारा पलायन कर चुके हैं। हालांकि महाराष्ट्र में दोबारा संक्रमण बढ़ने के बाद 40 फीसदी श्रमिक फिर से लौट आए हैं।
लाकडाउन की कहानी श्रमिकों की जुबानीः छुईखदान ब्लाक के गंडई में रहने वाले संतोष साहू व मनोहर लाल साहू ने लाकडाउन की कहानी बयां की। उन्होंने कहा कि वो अपने परिवार के साथ रोजी-मजदूरी के लिए हैदराबाद गए थे। लौटने के लिए कोई वाहन नहीं मिल रहा था। लाकडाउन में करीब एक महीना बिना काम के वहीं रुकना पड़ा। खाने-पीने की दिक्कत बढ़ गई थी तो पैदल ही गंडई के लिए निकले। चार दिनों में जिले की सीमा पर पहुंचे तो एक निजी वाहन के चालक ने उन्हें राजनांदगांव में छोड़ा, वहां एक दिन रुककर सभी गंडई लौटे। आर्थिक संकट था। इसी बीच प्रशासन ने मनरेगा योजना शुरू की, जिसमें रोजगार भी मिला। संतोष साहू ने बताया कि वो अनलॉक होने के बाद फिर काम के लिए हैदराबाद जाना चाहते थे, लेकिन कोरोना महामारी और परिवार के लोगों की समझाइश के बाद से वो गांव में ही रहकर राजमिस्त्री का काम कर रहे हैं।
