राजनांदगांव 22 फरवरी। जैन साध्वी श्री चंदनबाला श्री जी ने कहा कि किसी को कुछ बोलने से पहले विचार कर ले , उसके बाद कुछ बोले क्योंकि यह वाणी बहुत काम कर सकती है । उन्होंने कहा कि वाणी चाहे तो घाव में मरहम लगा सकती है और चाहे तो नए घाव बना सकती हैं । हमारी वाणी लोगों के घाव में मरहम लगाने का काम करनी चाहिए ।* साध्वी श्री चंदनबाला श्री जी ने आज जैन बगीचे स्थित ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में अपने प्रवचन ने कहा कि हर कार्य की एक मर्यादा होती है, वाणी भी मर्यादित होनी चाहिए । उन्होंने कहा कि वन और उपवन दोनों में अंतर होता है । वन वह होता है जो व्यवस्थित नहीं होता किंतु उपवन व्यवस्थित होता है , उसमें माली होता है जो उस उपवन को व्यवस्थित रखता है । उन्होंने कहा कि इसी तरह हमारा जीवन भी व्यवस्थित होना चाहिए । वाणी संयमित होनी चाहिए तभी जीवन व्यवस्थित हो सकता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति पैसों से बड़ा नहीं होता बल्कि विचारों और मान से बडा़ होता है । वाणी और व्यवहार से बडा़ होता है । हर व्यक्ति अपने आप का निरीक्षण करें ,अवलोकन करें और अपने जीवन को व्यवस्थित करें। उन्होंने कहा कि जिस तरह जीवन में पानी को हम छानकर पीते हैं !उसी तरह वाणी को जानकर तथा विचार कर उपयोग में लायें । इससे पूर्व साध्वी जी की शिष्या जीवन और वाणी के महत्व को बता रही थी। उन्होंने कहा कि जीवन दुर्लभ है और मानव जीवन अति दुर्लभ । यह जीवन हमें मिला है तो इसके साथ ही कई शक्तियां भी हमें साथ-साथ मिली है जैसे बोलने की शक्ति। यह वह शक्ति है जिससे हम किसी के मन में बस सकते हैं । उन्होंने कहा कि 84 लाख योनियां मानी जाती है जिनमें से 52 लाख योनियों में हमें जुबान नहीं मिलती। मनुष्य जीवन एक ऐसा जीवन है जिसमें बोलने की शक्ति के साथ साथ हमें सुनने और ग्रहण करने की शक्ति भी मिलती है इसलिए हमें विचार कर किसी भी शब्द का उपयोग करना चाहिए ताकि किसी को हमारी वाणी से दुख ना पहुंचे।
