नकलची साहित्य को बताया खतरनाक
साहित्य लेखन में बढ़ती नकल की प्रवृत्ति और इससे उत्त्पन्न सवाल पर आयोजित एक ऑनलाइन संगोष्ठी में हिंदी, अंग्रेजी और भोजपुरी के लेखक-साहित्यकारों ने चिंता व्यक्त की है. इस प्रसंग में विशेषकर हिंदी और भोजपुरी साहित्य में लिखित नकलची रचनाओं का उल्लेख किया गया. यह भी कहा गया कि अंग्रेजी और उर्दू की कई पुस्तकों का हिंदी अनुवाद कर उसे मौलिक बताया गया है, जबकि उसे अनूदित माना जाना चाहिए. ‘भोजपुरी साहित्य के इतिहास’ नामक पुस्तक में उद्धृत कई प्रसंगो को सप्रमाण लिफ्टेड बताया गया और इसके संशोधित संस्करण की आवश्यकता बताई गई.
सोशल मिडिया के ‘पंचमेल’ फेसबुक समूह द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में डॉ. ब्रजभूषण मिश्रा (पटना), डॉ. जयकांत सिंह ‘जय’ (मुजफ्फरपुर), डॉ. विष्णुदेव तिवारी (बक्सर), डॉ. शंकर मुनि राय राजनांदगाव, छत्तीसगढ़) डॉ. प्रमोद तिवारी (गुजरात) और संतोष पटेल (दिल्ली) ने प्रमुख वक्ता के रूप में भाग लिया. संगोष्ठी का आयोजन डॉ. पृथ्वीराज सिंह (छपरा, बिहार) ने किया था.
सर्वप्रथम संयोजक डॉ. पृथ्वीराज सिंह ने संगोष्ठी के उद्देश्य पर प्रकाश डाला और विषय प्रवर्तन के लिए केंद्रीय विश्वविद्यालय, अहमदबाद गुजरात के प्रोफेसर डॉ. प्रमोद तिवारी को आमंत्रित किया. प्रोफेसर प्रमोद तिवारी ने लोकसाहित्य के तथ्यों को सार्वजनिक बताते हुए कहा कि इसके लेखन में मौलिकता को स्पस्ट करना मुश्किल है. लेकिन आलोचना, समीक्षा और अनुसंधानी कार्य में संदर्भोल्लेख को आवश्यक बताया. एकेडमिक अनुसन्धान में प्लेगरिज्म को स्पष्ट करते हुए आपने कॉपीराइट और कॉपीलेफ्ट का उल्लेख किया.
डॉ. विष्णुदेव तिवारी ने भोजपुरी साहित्य में सृजित कई पुस्तकों एवं शोधालेखों को सीधा नकल बताते हुए उसे साहित्यिक चोरी कहा. साथ ही विश्विद्याल प्रकाशन, वाराणसी से प्रकाशित ‘भोजपुरी साहित्य के इतिहास’ नामक पुस्तक की मौलिकता पर सवाल उठाया और उसमे उद्धृत प्रसंगों को सप्रमाण अमौलिक बताया. उदाहरण के तौर पर इसमें डॉ. चंद्रधर पांडेय ‘कमल’ द्वारा लिखित उपन्यास ‘अर्जुन’ को पौराणिक उपन्यास बताने पर आपत्ति जाहिर करते हुए कहा कि इससे लगता है कि लेखक ने उपन्यास को नहीं देखा है, क्योंकि ‘अर्जुन’ सामाजिक कथानक का उपन्यास है जिसमे अर्जुन एक ग्रामीण चरित्र का नाम है. आपका आग्रह था कि इस पुस्तक का संशोधित संस्करण तत्काल आना चाहिए. डॉ. जयकांत सिंह ‘जय’ ने साहित्य लेखन में पारम्परिक सोच बदलने पर बल दिया. इस प्रसंग में आपने कई महत्वपूर्ण रचनाओं को पारम्परिक तर्ज का बताते हुए उसमे मौलिकता का अभाव बताया.
डॉ. शंकर मुनि राय ने कहा कि इतिहास, अनुसन्धान और समीक्षा साहित्य के लेखन के मानदंड अलग-अलग है. ऐतिहासिक प्रसंग बिना अनुसन्धान के नहीं बदलते है, अनुसन्धान में किसी भी ग्रन्थ से लिए गए उद्धरण का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया हो तो उसे नक़ल माना जाता है. साहित्य लेखन में सुचिता नहीं रहने से भावी पीढ़िया गलत समझने के लिए मजबूर हो सकती है.
भोजपुरी के वरिष्ठ डॉ. ब्रजभूषण मिश्रा ने कहा कि साहित्य सर्जना में किसी भी प्रसंग में लिए गए किसी के विचार का सन्दर्भ सहित उल्लेख जरुरी है, यदि कोई ऐसा नहीं करता है तो उसे नकल माना जायेगा. विशेषकर ऐतिहिस और आलोचनात्मक कृतियों में इन नियम का पालन बहुत आवश्यक है.
सारांशतः यह निर्णय किया गया कि “भोजपुरी साहित्य के इतिहास’ के प्रकाशक को पत्र लिख कर संशोधित संस्करण निकालने का आग्रह किया जाय, साथ ही इस तरह के ऐतिहासिक ग्रंथों के लिए विशेषज्ञों का सम्पादक मंडल गठित किया जाना चाहिए. डॉ. प्रमोद का सुझाव था कि किसी भी भाषा के साहित्यिक विधाओं का विधावार सूची प्रकाशित करने से अनुशंधानी कार्य में सुविधा होगी
