बिलासपुर -परंपरागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत बिलासपुर जिले में विकासखण्ड-कोटा के ग्राम सिलदहा, भैंसाझार, और बछालीखुर्द में 500 हेक्टेयर चयनित रकबे को जैविक में रूपांतरित किया गया है। इस रकबे मेंएच.एम.टी. धान की जैविक विधि से उत्पादन कराया जा रहा है। जिसमें 13000 क्विंटल जैविक धान के उत्पादन की संभावना हैं।किसानों के जैविक उत्पाद की ब्रांडिंग, पैकेजिंग और विपणन की व्यवस्था भी की जाएगी।
विकासखण्ड कोटा के इन ग्रामों के कृषक जैविक हरी खाद जैसे-ढंेचा की बोनी एवं मथाई कर तथा जैविक उर्वरकों एवं वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग जैविक धान के उत्पादन हेतु कर रहे हैं। इनके उपयोग से खेतों को 3.50 प्रतिशत नत्रजन, 0.70 प्रतिशत फॉस्फोरस तथा 1.30 प्रतिशत पोटाश उपलब्ध होता है।
खात बात यह भी है कि कृषकों द्वारा हरी खाद का उपयोग करने से 60 से 70 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर नत्रजन प्राप्त हो रहा है। आमतौर पर कृषि वैज्ञानिकों द्वारा धान की खेती में 120 किलोग्राम नत्रजन, 60 किलोग्राम फॉस्फोरस एवं 40 किलोग्राम पोटाश का प्रयोग करने की अनुशंसा की जाती है परंतु जैविक विधि से खेती करने पर 3 बोरी यूरिया एवं 1.5 बोरी पोटाश की बचत हो रही है जिसके कारण प्रति हेक्टेयर 5000 रूपए से 6000 रूपए प्रति हेक्टेयर तक बचत हो रही है।
उप संचालक कृषि शशंाक शिंदे ने बताया कि जिले में गत वर्ष से यह योजना संचालित है, इसके तहत कोटा विकासखंड के तीन ग्रामों में 500 हेक्टेयर रकबे में जैविक फसल प्रदर्शन विभाग द्वारा किया जा रहा है। जिसका प्रमुख उद्देश्य रासायनिक खादों, कीटनाशकों एवं अन्य हानिकारक रसायनों के फसलों में इस्तेमाल को रोकना है, साथ ही जैविक उत्पादांे के उपयोग एवं विपणन को बढ़ावा देना है।भारत सरकार की सहभागिता प्रतिभूति प्रणाली अंतर्गत जैविक उत्पादन को प्रमाणित कर कृषकों को जैविक प्रमाण पत्र भी प्रदाय किया जा रहा है जिससे जैविक उत्पादों का उचित विपणन मूल्य प्राप्त हो सके।
परम्परागत कृषि विकास योजनांतर्गत जैविक खेती को बढ़ावा देन हेतु प्रति हेक्टेयर जैविक आदानों में 10000 से 12000 रूपए प्रति हेक्टेयर तक का अनुदान दिया गया है, जिससे रसायनमुक्त खेती को बढ़ावा मिल सके।भूमि की कार्बनिक उपजाऊ क्षमता में बढ़ोत्तरी ग्राम बछालीखुर्द में जैविक खेती करने वाले किसान संतोष राज ने बताया है कि परंपरागत विधि से जैविक खेती करने के कारण रासायनिक उर्वरकों के प्रति निर्भरता कम हुई है एवं कीटनाशकों के उपयोग बंद करने से भूमि की कार्बनिक उपजाऊ क्षमता में बढ़ोत्तरी हो रही हैं।
