राजनांदगांव. अखिल विश्व में अद्वितीय अनुपम भारतीय सनातन संस्कृति के प्रकृति अनुकूल नववर्ष एवं चैत्र नवरात्रि पर्व के परम पावन अवसर परिप्रेक्ष्य में नगर के विचार प्रज्ञ प्राध्यापक कृष्ण कुमार द्विवेदी ने समसामयिक विचार चिंतन में बताया कि प्रकृति एवं प्रकृति तत्वों -जल, वायु, मिट्टी, अग्नि वृक्षों के शुद्ध-विशुद्ध स्वरूपों के प्रत्यक्ष पूजन के इस महत्तम पर्व का मूल संदेश यही हैं कि देश-धरती का प्रत्येक जन-जन सर्वजन प्रथमत: प्रकृति तत्वों के संरक्षण-संवर्धन के लिए मन-प्राण-प्रण से संकल्पित हो तथा चतुर्दिक फैले दूषण प्रदूषण को दूर करने की सही सार्थक पहल करें। उल्लेखनीय रूप से चैत्र नवरात्रि के नव दिवसों में माँ-देवी शक्ति के नौ रूपों-शैलपुत्री, ब्रम्हाचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यानी, कालरात्रि, सिद्धिदात्री एवं महागौरी का पूजन-वंदन होता है जो सहज-सरल रीति-नीति से मुख्यत: स्वच्छ जल, वायु, मिट्टी एवं वृक्ष-वनस्पत्ति-खाद्य फसलों से प्राप्त द्रव्यों के साथ पूजन-वंदन की गौरवशाली परंपरा सनातन काल से चली आ रही है। जिसका निर्वहन अधिसंख्य जन अपने-अपने स्तर से व्यक्तिगत रूप में घर-परिवार तथा सार्वजनिक शक्तिपीठों – मंदिरों में करते हैं। साथ ही हम सभी पर्व-पूजन में प्रतीक रूप से प्रकृति तत्वों से बने मिट्टी दीप- मिट्टी कलश, प्रकृति जलस्रोतों से प्राप्त जल से भरे धातु पात्रों से अभिसिंचन, जैविक मिट्टी से अंकित जंवारा, देशी घृत-तेल-कपास-बाती के ज्योति घट स्थापन। वन-वनस्पितयों के नवपत्रों पुष्पों के साथ तोरण सजावट, फलों के समर्पण एवं फलाहार के साथ देशी-वेशभूषा में आसन-चौकी पर शांत-प्रशांत, मन-मस्तिष्क से देवी-ग्रंथों, बीज मंत्रों के पाठन-वाचन के साथ पूजन करना वास्तव में प्रकृति तत्वों और उनके समस्त अव्यव- स्वरूपों का संरक्षण-संवर्धन करने का संकल्प ही होता है। आगे प्राध्यापक द्विवेदी ने विशेष आह्वान किया कि हमारी सत्य सनातन काल से चली आ रही इस अतीव गौरवशाली अनुकरणीय प्रकृति पूजन एवं प्रकृति तत्वों के वंदन के साथ संरक्षण-संवर्धन परंपरा को स्वीकार करते हुए प्रकृति अनुकूल जीवन-शैली को अवश्य स्वीकारें तथा प्रत्येक कार्य व्यवहार में प्रकृति तत्वों के संरक्षण-संवर्धन के मूल संदेश को हमेशा स्मृत रखें। यही इस प्रकृति अनुकूलित परम पावन पर्व का मूल संदेश है। जिसका श्रेष्ठ सार्थक निर्वहन ही मातृ-शक्ति का पूजन-वंदन हैं।
