कोई भी शुभ कार्य जल्द कर डालिए, मन पर छोड़ा तो टलते रहेगा
राजनांदगांव 21 जनवरी। जैन मुनि सम्यक रतन सागर जी ने कहा कि मन की अनेक प्रकार की चाल है । वह हमेशा शुभ कार्यों को विलंब करेगा और अशुभ कार्यो को जल्द से जल्द करने को प्रेरित करेगा। हमारे ऐसे ही कार्य हमें दुर्गति के मार्ग की ओर ले जाते हैं। सिद्ध गति और सद्गति का मार्ग खोलना है तो शुभ कार्यों को डिले ना करें।
मुनि श्री ने कहा कि उत्तम कार्य के लिए यदि डिले किया तो समय टलता ही जाएगा ,आने वाला कल फिर कभी नहीं आएगा जो कुछ भी है वर्तमान ही है । अपने सद्गुणों के विकास के लिए क्षण भर भी विलंब ना करें। उन्होंने कहा कि जो वर्तमान में जी सकता है, वर्तमान को संवार सकता है, वह ही अपना विकास करता है। क्षण भर के लिए भी प्रमाद न कीजिए। मन से तीन प्रश्न अवश्य पूछ लीजिए- पहला आयु क्षण भंगुर है। दूसरा पुण्य धोखेबाज है और तीसरा मन चंचल है।
मुनि श्री ने कहा कि जिसने जीते जागते मौत का दर्शन कर दिया , वह कभी समय की अवहेलना नहीं कर सकता। जन्म और मृत्यु के बीच का अंतराल किसी को भी विदित नहीं है। रोग और मौत दो ऐसे क्षेत्र हैं जिसमें जूनियर और सीनियर का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने कहा कि जाना तुम्हारे हाथ में नहीं है तो रहना भी तुम्हारे हाथ में नहीं है। हर मानव के शरीर में पौने तीन करोड़ रोम छिद्र हैं और हर छिद्र में पौने तीन रोग है। जब तक पुण्योदय नहीं होगा तब तक रोग को जान नहीं पाओगे। आप चाहोगे तो प्लेन का टिकट, रेलवे का टिकट ले सकते हो किंतु मौत का टिकट आपके पास है। रेलवे का टिकट सिर्फ ट्रेन में काम आता है और प्लेन का टिकट प्लेन में काम आता है किंतु मौत का टिकट कहीं भी काम आ जाता है। उन्होंने कहा कि जो अच्छा काम करना है वह आज ही कर लें।
मुनि श्री ने कहा कि पुण्य कभी भी धोखा दे देता है। उन्होंने कहा कि ध्वजा पवन की वजह से हिलती डुलती है और मनुष्य पुण्य की वजह से हिलता डुलता है परंतु पवन और पुण्य का कोई भरोसा नहीं, वह कभी भी धोखा दे सकता है। उन्होंने कहा कि जो अपनी शक्ति से दुनिया को हिला दे वह पुण्य है और जिसे दुनिया की कोई भी शक्ति न हिला सके वह है धर्म। यदि आपने किसी गलत रास्ते से पैसा किसी का हड़पा तो यह अवश्य है कि आपका वह पैसा आपके पास नहीं रहेगा।
मुनि श्री ने कहा कि मन चंचल है । यदि पुण्य साथ भी दे देगा तो मन साथ दे दे , इसकी कोई गारंटी नहीं है। दूध को उबलने में समय लगता है किंतु मन को बदलने में कोई समय नहीं लगता। आपने यदि अपने मन को बीच में लाया तो यह समझ लो कि आपका वह कार्य टल जाएगा। देखते हैं, सोचते हैं आदि, विचार वाले वक्तव्य से यह समझ लो कि वह कार्य फिर नहीं होगा। दान देने, सन्यास लेने , जैसे विषयों में आदमी नहीं सोचता। इसे झट से कर डालता है। उन्होंने कहा कि दान देने और सन्यास लेने की बात मन पर मत छोड़ो । मुनिश्री ने कहा कि मन की मानोगे तो मर जाओगे और मन को मारोगे तो तिर जाओगे।
