राजनांदगांव 16 जनवरी। जैन साध्वी प्रियंकरा श्री जी ने आज यहां कहा कि हमें सुगंध पसंद है और दुर्गंध आती है तो हम नाक भौं सिकोड़ने लगते हैं । जो अनुकूल है उसे हम ग्रहण करते हैं । उसमें राग होता है और जो प्रतिकूल है वह द्वेष है । हमें दोनों से अपने आपको दूर रखना होगा। हमारा दोनों से जुड़ाव नहीं होना चाहिए।
जैन बगीचे में आज उन्होंने कहा कि गाली , घी की थाली होती है। उन्होंने कहा कि गाली हमने सुनी और उसका कोई रिएक्शन नहीं दिया तो यह गाली घी की थाली बन जाएगी। यह गाली हमारे लिए उपहार के समान होगी। उन्होंने कहा कि अपनी जबान मिश्री की डली बनाएं और कभी भी कटु शब्द ना बोले क्योंकि तलवार से बना घाव भर सकता है किंतु कटु जबान से हुआ घाव कभी नहीं भरता है। साध्वी श्री ने कहा कि मुख्य रंग तो पांच है बाकी शेष जितने भी रंग दिखते हैं , वह इन पांच रंगों से मिलकर ही बने होते हैं । कौन सा रंग हमें अच्छा लगता है और कौन सा नहीं? यह हमारे ऊपर है किंतु हम राग द्वेष के इस संसार में हम फंसते ही चले जाते हैं । हमें राग-द्वेष के संसार से दूर रहना है और उसकी आसक्ति को तोड़ना है और अपनी चेतना को संभालना है।
संयम यात्रा धर्म जीवन की शुरुआत है – संवेग रतन सागर जी
जैन मुनि संवेग रतन सागर जी ने कहा कि संयम जीवन , धर्ममय जीवन की शुरुआत है। उन्होंने कहा कि सुख सभी को चाहिए किंतु उस मार्ग पर जाने वाले रास्ते पर हम नहीं चलते। उन्होंने कहा कि मानव मात्र का जीवन ऐसा है जो एक ही गड्ढे में बार-बार गिरता है। वह सुख प्राप्त करने के लिए पाप के मार्ग को चुनता है और उस गड्ढे में वह गिरता ही जाता है ।
संवेग मुनि ने आज यहां कहा कि संयम का मार्ग थोड़ा कठिन तो है किंतु सुरक्षित है। इसके लिए हमें हमारी मान्यताओं को त्यागना पड़ता है। हमें अपने स्वयं के विरुद्ध युद्ध लड़ना पड़ता है। उन्होंने कहा कि जब तक जीवन में पापों का विराम नहीं होगा तब तक दुख का निवारण नहीं होगा। दुख यदि फल है तो पाप उसका बीज। उन्होंने कहा कि बीज यदि कड़वा हो तो फल भी कड़वा होता है और मीठा हो तो उसका फल भी मीठा होता है किंतु यहां इसके ठीक उल्टा होता है। दुख कड़वा बीज होता है और उसका फल पाप हमें मीठा लगता है किंतु वास्तविक स्थिति में वह मीठा नहीं होता है। जीव जितनी बार पाप करता है वह उसमें धंसता ही चला जाता है। उसे पाप अच्छा लगता है। वह धर्म कर अनुकूल परिस्थितियों का त्याग नहीं करना चाहता अपनी मान्यताओं को नहीं छोड़ना चाहता।
मुनि श्री ने कहा कि मूर्ख और होशियार को समझाया जा सकता है और वह यह मान भी लेते हैं। क्योंकि मूर्ख कुछ जानता नहीं है इसलिए उसे किसी बात को समझाया जाए तो वह उसे स्वीकार लेता है । होशियार को उसके हित की बात बता दी जाए तो वह उसे स्वीकार लेता है किंतु मूढ व्यक्ति कुछ समझने की कोशिश ही नहीं करता और पापों का क्रम उसके जीवन में चलता ही जाता है । संयम एक यात्रा है और यह धर्ममय जीवन की शुरुआत है। सुख सभी को चाहिए किंतु उसकी प्राप्ति के लिए किए जाने वाले कार्य को कोई करना नहीं चाहता जबकि तात्कालिक सुख प्राप्ति के लिए वह पाप के रास्ते को अपना लेता है। उन्होंने कहा कि जो स्व उपकार करने निकलता है, वह परोपकार नहीं कर सकता और जो परोपकार करने निकलता है वह दूसरे के उपकार के साथ-साथ अपने स्वयं का भी उपकार करता है।
