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साल में दो बार खुलती है पवित्र सीढ़ी
मंदिर की परंपरा के अनुसार श्रद्धालु आम दिनों में मंदिर के पीछे स्थित द्वार से होकर भगवान की पीठ के पीछे से परिक्रमा करके मुख्य गर्भगृह के सामने आकर दर्शन करते हैं। मकर संक्रांति पर 41 दिनों के व्रत का संकल्प लेने वाले श्रद्धालुओं के लिए साल में दो बार मंदिर की पवित्र सीढि़यों को खोला जाता है। इन सीढ़ियों से केवल व्रत करने वाले जाते हैं। पहली बार मंदिर में होने वाली मंगल पूजा पर और दूसरी बार मकर संक्रांति पर सीढ़ियां खुलती है। व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के अलावा अन्य श्रद्धालु पीछे के द्वार से दर्शन करते हैं।
व्रतधारी धारण करते हैं सिर पर पोटली
अयप्पा सेवा संघ के अध्यक्ष विनोद पिल्लई के अनुसार 14 जनवरी को मकर संक्रांति पर सुबह 4.30 बजे गणपति होम, अभिषेक, भागवत परायण और उषा पूजन संपन्न होगी। सुबह पल्लिकेटु के बाद 8.30 बजे श्रद्धालु पवित्र सीढि़यां चढ़कर भगवान के श्रीविग्रह का दर्शन करेंगे। श्रद्धालुओं के सिर पर पोटली होगी, जिसे इरूमुड़ी कहा जाता है। इस पोटली में पूजन की सामग्री होती है। श्रद्धालु गर्भगृह पहुंचकर भगवान का घी से अभिषेक करेंगे। इसके बाद 10.30 से 11 बजे तक उच्च पूजा संपन्न की जाएगी।
शाम को प्रज्ज्वलित की जाएगी हजारों ज्योति
भगवान अयप्पा मंदिर में शाम को दीप आराधना की जाएगी। मंदिर के मुख्य द्वार से लेकर गर्भगृह, पूजा स्तंभ तक हजारों दीप प्रज्जवलित किए जाएंगे। इसके पश्चात भजन-कीर्तन, भोग पूजा संपन्न की जाएगी। रात्रि 9.30 बजे प्रसाद वितरण किया जाएगा।
18 सीढ़ियों का महत्व
ऐसी मान्यता है कि मंदिर की 18 सीढ़ियों में से पहली पांच सीढ़ी को मनुष्य की पांच इन्द्रियां कहा जाता है। इसके बाद की आठ सीढ़ी आठ भावनाओं की प्रतीक है। अगली तीन सीढ़ियां मानव के तीन गुणाें को दर्शाती है। आखिरी दो सीढ़ियां ज्ञान- अज्ञान का प्रतीक हैं। यह भी मान्यता है कि सनातन धर्म के 18 पुराणों, 18 शस्त्रों, 18 सिद्ध पुरुष, 18 देवता और 18 गुण से इन सीढ़ियों को जोड़ा जाता है।
