शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत निजी स्कूलों में कमजोर और गरीब तबके के बच्चों के लिए सीटें आरक्षित की गई हैं। इस बार जिले में 4560 सीटें आरक्षित हैं पर विडंबना है कि अब तक केवल 3449 आवेदन ही आए हैं और 1058 सीटें रिक्त हैं। इन सीटों को भरने के लिए शिक्षा विभाग की ओर से भी ग्राउंड लेवल पर कोई वर्क ही नहीं किया जा रहा है।
गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को आरक्षित सीटों में बच्चों को एडमिशन दिलाने के लिए प्रेरित तक नहीं कर रहे हैं। जबकि पहले शिक्षा विभाग की ओर से वार्ड स्तर पर शिविर लगाकर लोगों को आरक्षित सीटों के साथ ही एडमिशन प्रक्रिया की पूरी जानकारी दी जाती थी पर कोविड काल का हवाला देकर अफसर खामोश हैं। आरक्षित की गई सीटों के लिए ग्रामीण स्तर से कम आवेदन आ रहे हैं। शहरी क्षेत्र के आवेदन ही पोर्टल में आए हैं।
जागरूकता नहीं, ग्रामीण क्षेत्र से कम आवेदन आए
शिक्षा विभाग की ओर से ग्रामीण बेल्ट में भी आरटीई को लेकर जागरूकता अभियान नहीं चलाया जा रहा है। दो साल से आरटीई एडमिशन की प्रक्रिया ठप पड़ी हुई है जबकि ऑनलाइन आवेदन के माध्यम से निजी स्कूलों में एडमिशन की प्रक्रिया पूरी करानी है। अफसरों की ओर से सीटें भरने गंभीरता नहीं दिखाए जाने की वजह से बीते शिक्षा सत्र में भी निजी स्कूलों में 1600 सीटें रिक्त रह गईं थीं।
कमजोर और गरीब वर्ग में इसका प्रचार नहीं हो रहा, हर साल सैकड़ों सीटें खाली
पात्रता के लिए यह जरूरी
निजी स्कूल संचालक सभी सीटों को भरना चाहते हैं पर आवेदन नहीं आने से सीटें रिक्त रह जा रहीं हैं। आरटीई के तहत दिव्यांग, एससी, एसटी, ओबीसी, अंत्योदय कार्डधारी, वन पट्टाधारियों को प्राथमिकता के साथ आरक्षित सीटों में एडमिशन देना है पर इन तक जानकारी नहीं पहुंच पाने की वजह से ये शिक्षा के अधिकार से वंचित हाे रहे हैं। डीईओ एचआर सोम का कहना है कि नोडल अफसरों को अपने आसपास के क्षेत्र में इसकी जानकारी चस्पा करने निर्देशित किया गया है। डीपीआई के माध्यम से आरटीई की लॉटरी निकाली जाती है फिलहाल तिथि तय नहीं हुई है।
