पलारी, ग्राम दरबा में आयोजित संगीतमय शिवमहापुराण कथा के चौथे दिन पं. अमित सरस भारती झा ने अहंकार के दुष्परिणामों पर मार्मिक प्रसंग सुनाया। कथा के दौरान उन्होंने कुबेर और भगवान गणपति से जुड़ा प्रसंग सुनाकर श्रोताओं को गहन आध्यात्मिक संदेश दिया।
कथावाचक ने बताया कि कुबेर तीनों लोकों में सबसे धनी माने जाते थे। एक दिन उनके मन में यह अहंकार उत्पन्न हुआ कि उनके पास अपार संपत्ति है, लेकिन बहुत कम लोग इससे परिचित हैं। इसी अहंकारवश उन्होंने अपनी संपन्नता के प्रदर्शन के लिए एक भव्य भोज का आयोजन करने का निश्चय किया और तीनों लोकों के समस्त देवी-देवताओं को आमंत्रण भेजा। भगवान शिव को अपना इष्टदेव मानने वाले कुबेर कैलाश पहुंचे और शिवजी से आशीर्वाद लेते हुए बोले कि आज वे तीनों लोकों में सबसे धनी हैं, जो सब प्रभु की कृपा का ही फल है।
साथ ही उन्होंने अपने निवास पर आयोजित भोज में भगवान शिव से परिवार सहित पधारने का आग्रह किया। भगवान शिव ने कुबेर के मन में छिपे अहंकार को भांप लिया और कहा कि वे कहीं बाहर नहीं जाते। इस पर कुबेर गिड़गिड़ाने लगे और बोले कि प्रभु के बिना उनका आयोजन व्यर्थ हो जाएगा। तब शिवजी ने उपाय बताते हुए कहा कि वे अपने छोटे पुत्र गणपति को भोज में भेज देंगे।
यह सुनकर कुबेर संतुष्ट होकर लौट आए। नियत समय पर कुबेर ने अत्यंत भव्य भोज का आयोजन किया। तीनों लोकों के देवता भोज में उपस्थित हुए। अंत में भगवान गणपति पहुंचे और आते ही कहा कि उन्हें बहुत तेज भूख लगी है और तुरंत भोजन चाहिए। कुबेर उन्हें भोजन कक्ष में ले गए, जहां सोने की थालियों में विविध व्यंजन परोसे गए।
हमें किसी भी चीज का घमंड नहीं करना चाहिए गणपति जी ने क्षण भर में सारा भोजन समाप्त कर दिया। बार-बार भोजन परोसा गया, लेकिन हर बार गणपति जी सब कुछ चट कर जाते। थोड़ी ही देर में हजारों लोगों के लिए तैयार किया गया समस्त भोजन समाप्त हो गया, फिर भी गणपति जी की भूख शांत नहीं हुई। इसके बाद गणपति जी रसोईघर पहुंचे और वहां रखा सारा कच्चा सामान भी खा गए। जब कुछ भी शेष नहीं बचा, तब गणपति जी ने कुबेर से कहा,जब तुम्हारे पास मुझे खिलाने के लिए कुछ था ही नहीं, तो मुझे भोज का निमंत्रण क्यों दिया? यह सुनते ही कुबेर का सारा अहंकार चूर-चूर हो गया।
