राजनांदगांव. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आम जन-जन में महान क्रांति की लहर जागृत करने वाले तत्समय के अनुपम उपन्यासकार बंकीमतचंद्र चटर्जी के आनंदमठ से उदृग्रहित वंदेमातरम की रचना के 150वर्ष पूर्ण होने के गौरव परिप्रेक्ष्य अवसर पर नगर के वरिष्ठ चिंतक विचारप्रज्ञ डॉ. कृष्ण कुमार द्विवेदी ने विशिष्ट आह्वान टीप में बताया कि 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकृत गीत मूलत: वंदेमातरम गीत माँ भारती का संस्कृत भाषा में रचित स्तुति गीत है जो सनातन संस्कृति परंपरा में अद्वितीय मनभावनी वंदना प्रस्तुत करता है।
महर्षि अरविंद के अंग्रेजी अनुवाद आधार पर आगे डॉ. द्विवेदी ने विशेष रूप से बताया कि – माँ मैं प्रणाम करता हूँ। जल समृद्धि और फल वृद्धि से युक्त माँ, मलयानिल की शीतलता एवं सस्यों की श्यामलता से युक्त माँ चांदनी में आपकी रातें उल्लसित होती है। पुष्पा वर्णो से सजकर आपकी मिट्टी में तुमदल शोभित होते है। मधुर हासिनी, मधुर भासिनी, सुखदायिनी, वरदायिनी माँ उल्लेखनीय है कि इस अमर राष्ट्रगीत का प्रथम गायन सन 1896 के इंडियन नेशनल काँग्रेस सम्मेलन में हुआ था सर्वोत्तम जानकारी यह कि विशेषकर वर्तमान युवा जन के लिए कि इस अमर गीत का मधुर संगीत गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने दिया था।
वास्तव में वंदे मातरम् गीत अमर भारतीयता का गौरव स्वर है जिसे प्रत्येक भारतीय को गाकर, श्रवण कर विशिष्ट देशभक्ति और रोमांच का अनुभव होता है। श्रेष्ठ सार्थक अर्थो में प्रत्येक भारतीय को उसका गायन मात्र समग्र मनप्राण के साथ विशुद्ध रूप में माँ भारती के प्रति उत्कृष्ठ भक्ति-भाव से भर उठता है। आइये इस अमर राष्ट्रीय गीत को वंदे मातरम को मनसा-वाचा-करूणा से स्वीकार कर विशिष्ट अवसरों पर हमेशा गायन करें। यही इस अमर गीत के प्रति सच्ची श्रेयष्कर सम्मानजंलि होगी।
