राजनांदगांव. शिवनाथ नदी के पवित्र तट पर आज से आरंभ हो रहा तीन दिवसीय मोहारा पुन्नी मेला न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और परंपरा का जीवंत उत्सव भी है। रियासतकाल से चली आ रही इस 100 वर्षीय परंपरा में आज भी वही भक्ति और उल्लास की भावना देखी जाती है, जो पीढ़ियों से लोगों के हृदय में रची-बसी है।
मेले की शुरुआत 4 नवंबर मंगलवार को भगवान शंकर की पूजा-अर्चना से होगी। इसके बाद श्रद्धालु 5 नवंबर पूर्णिमा की पहट बेला में शिवनाथ नदी में पुन्नी स्नान करेंगे और दीपदान कर पुण्य अर्जित करेंगे। मान्यता है कि इस दिन स्नान व पूजा से आत्मिक शुद्धि और समृद्धि प्राप्त होती है। मन में शांति का अनुभव होता है। सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन ने कड़े इंतजाम किए हैं। नदी किनारे पुन्नी स्नान को लेकर पर्याप्त रोशनी (लाइट) की व्यवस्था की गई है। सुरक्षा को लेकर पुलिस जवान और गोताखोरों की टीम मौजूद रहेगी। महिलाओं के लिए अस्थायी चेंजिंग रूम और चिकित्सा केंद्र भी बनाए गए हैं। शिवनाथ तट क्षेत्रीय विकास समिति के पदाधिकारी व सदस्यों ने बताया कि यह मेला ग्रामीण और शहरी संस्कृति का संगम है, जो लोगों को अपनी परंपराओं से जोड़ता है।
रियासत काल में एक दिवसीय मेले की शुरुआत हुई। पहले इस मेले में स्थानीय ग्रामीणों की ही ज्यादा भागीदारी होती थी। तब लोग पैदल और बैल-गाड़ी से मेला स्थल पहुंचते थे। धीरे-धीरे धार्मिक अनुष्ठानों के साथ व्यापारिक स्टॉलों की शुरुआत हुई। झूले और लोकनृत्य शामिल हुए। दुकानें बढ़ी मेला ग्राउंड बढ़ा। मुय मार्ग से सीसी रोड बनी, स्थानीय कला मंच का निर्माण हुआ। अब मेला तीन दिवसीय हो गया, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, डिजिटल प्रचार, बेहतर सुरक्षा व प्रकाश व्यवस्था से मेला राज्यस्तरीय पहचान प्राप्त कर चुका है। वर्तमान समय में हजारों श्रद्धालुओं की भागीदारी रहती है।
3 दिवसीय आयोजन
तीन दिवसीय इस मेले में श्रद्धा के साथ-साथ लोक संस्कृति का रंगारंग प्रदर्शन भी देखने को मिलेगा। सांस्कृतिक विभाग द्वारा प्रतिदिन शाम को नृत्य-गान, लोकगीतों और पारंपरिक नाट्य प्रस्तुतियों का आयोजन किया जाएगा। झूले, स्टॉल, स्थानीय व्यंजन और हस्तशिल्प की दुकानों से पूरा मेला क्षेत्र उत्सव स्थल में तब्दील हो गया है।
