रायपुर। कोरोना त्रासदी के बीच कई स्वयंसेवी संस्थाएं लोगों की मदद करने से पीछे नहीं हट रही हैं। दिन-रात सड़क पर ड्यूटी करने वाली पुलिस भी भला इसमें पीछे क्यों रहती? दुर्ग पुलिस की एक पहल की सूबे भर में चर्चा हो रही है। दरअसल पुलिसकर्मियों व उनके परिवार के सदस्यों को स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए कंट्रोल रूम सेक्टर-6 भिलाई में पुलिस हेल्प डेस्क चलाया जा रहा है।
इस डेस्क का शानदार फीडबैक आया। लिहाजा पुलिस अफसरों को इसका दायरा बढ़ाना पड़ा। अब इसमें सेवानिवृत्त पुलिसकर्मियों व उनके परिवार को भी शामिल कर लिया गया। डेस्क का काम जुझारू एडिशनल एसपी संजय ध्रुव न केवल देख रहे हैं, बल्कि पीड़ितों की मदद भी कर रहे हैं। डेस्क में कोरोना जांच, टीकाकरण, दवाइयां, राशन की घर पहुंच सेवा और मरीजों को अस्पताल पहुंचाने एंबुलेंस की सुविधा दी जा रही है।
क्यों कांप रहे रसूखदारों पर हाथ
पुलिस की दोतरफा कार्रवाई की हमेशा चर्चा होती रही है। पिछले दिनों राजधानी अस्पताल अग्निकांड में सात कोरोना मरीजों की मौत का मामला गरमाया हुआ है। पुलिस ने अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही का मुकदमा तो कायम कर लिया, लेकिन दस दिन बाद यह पता नहीं लगा पाई कि अस्पताल का संचालक आखिर कौन है? यह चर्चा की जा रही है कि एक कांग्रेसी विधायक का यह अस्पताल है।
यही वजह है कि अब तक अस्पताल के दस्तावेजों में दर्ज पांच संचालक डाक्टरों के नाम स्वास्थ्य विभाग से मिलने के बाद भी पुलिस को अस्पताल प्रबंधन की तरफ से लिखित में सुबूत चाहिए। अग्निकांड में कोरोना मरीजों की जान चली गई। सरकार ने मृतकों के स्वजनों को चार-चार लाख रुपये का मुआवजा भी दे दिया, लेकिन लापरवाही बरतने वाले रसूखदार डाक्टरों की गिरफ्तारी तो दूर की बात पूछताछ तक करने से पुलिस बच रही है।
इतना भी न गिरो
आपदा में भी अवसर की तलाश करने वालों की दुनिया में कमी नहीं है। कोरोना संकटकाल में गरीब परेशान हैं। लाकडाउन होने से काम-धंधा बंद है। दुकानदार कालाबाजारी करने से बाज नहीं आ रहे हैं। किराना, सब्जी-भाजी तक दोगुना, तीन गुना दाम पर बिक रही हैं और प्रशासन चुप्पी साधकर बैठा है। इस बीच कोरोना मरीजों के लिए रामबाण कहे जाने वाले रेमडेसिविर इंजेक्शन की किल्लत ने स्वजनों की परेशानी बढ़ा दी है।
इसका फायदा निजी अस्पताल से लेकर दवा कंपनी, दुकान से जुड़े लोग भरपूर उठा रहे हैं। पांच सौ-हजार रुपये में मिलने वाले रेमडेसिविर इंजेक्शन को 15 से 30 हजार तक में बेच रहे हैं, वहीं निगरानी और धरपकड़ के नाम पर प्रशासन खानापूर्ति कर रहा हैै। पर्दे के पीछे से सारा खेल करने वाले रसूखदार छुट्टा घूम रहे हैं। लोग कहने लगे हैं, इतना भी न गिरो यारो, ऊपर वाले से तो डरो।
कोरोना ने रोकी ट्रांसफर लिस्ट
कोरोना के कारण आइएएस और आइपीएस अफसराें की तैयार बहुप्रतीक्षित ट्रांसफर लिस्ट रुक गई है। अब यह लिस्ट कब जारी होगी, इसे लेकर हर जगह चर्चा हो रही है। पिछले साल कोरोना के बावजूद सरकार ने 27 मई को 22 जिलों के कलेक्टरों समेत 29 आइएएस को इधर से उधर कर दिया था, लेकिन इस बार कोरोना की दूसरी लहर खतरनाक होने से सरकार की चिंता बढ़ा दी है।
लगता नहीं है कि सरकार अफसरों को बदलने के मूड है। मजबूरन दूसरे जिले में जाने के लिए तैयार बैठे आइएएस, आइपीएस भी कोरोना की त्रासदी खत्म होने का इंतजार कर रहे है। सूत्र बताते हैं कि जिले की कप्तानी से साल, दो साल से बाहर रहने वाले अफसरों को मौका दिया जाएगा। चर्चा है कि लाल उमेद सिंह, विजय अग्रवाल, राजेश अग्रवाल,शशिमोहन सिंह, अजातशत्रु बहादुर समेत अन्य को नया जिले की कमान सौंपी जाएगी।
