रायपुर । जिसके जीवन में अनुरोध और अनुमति का गुण आ जाएगा, वह शिष्टाचारी बन जाएगा। जिसके जीवन में ये दो चीज आ जाए उसका जीवन संवर जाएगा। भोगों को छोड़कर ही परमात्मा को पाना सच्ची भक्ति है। गुणों में सर्वश्रेष्ठ गुण विनय है। इस गुण की दो ही मांग है। पहला अनुरोध पूर्वक कार्य करो। दूसरा अनुमति पूर्वक कार्य को पूरा करो। कार्य को प्रारंभ करते समय अनुरोध करो और कार्य को पूरा करने से पहले अनुमति लो। ये सीख सोमवार को टेगौर नगर स्थित पटवा भवन में पर्युषण पर्व के छठवे दिन धर्मसभा में परम पूज्य उपाध्याय भगवंत युवा मनीषी मनीष सागरजी महाराज ने दी।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि परमात्मा का जन्म होने के बाद भक्ति उमड़ती है। भक्ति वही कर सकता है जिसका हृदय भक्त ह्रदय है। भक्त ह्रदय बनने अहंकार को गलाना पड़ता है। अहंकार को जमींदोज करना पड़ता है। साथ में अपने आदर्श के प्रति अहोभाव लाना होता है। उनके गुणों पर नजर लाना होता है। वासना में जीने वाला व्यक्ति रूप देखकर मोहित होता है लेकिन एक भक्त गुण देखकर मोहित हो जाता है। परमात्मा के जन्म से संसार आनंदित हो गया था। 56 दिगकुमारियां को जब पता चला तो उन्होंने भोगों को छोड़कर प्रभु की भक्ति और सेवा का लाभ लिया।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि व्यक्ति में चंचलता होती है। चंचलता नहीं होनी चाहिए। चंचलता का सदुपयोग कर कई लोग अपनी आत्मा की साधना में जोड़ लेते हैं। 56 दिगकुमारियां भी चंचल मन वाली थीं। परमात्मा का जन्म हुआ तो सिद्धार्थ महाराजा व इंद्र महाराजा को खबर नहीं पड़ी। पहले 56 दिगकुमारियों को खबर पड़ी। अपने भोगमय जीवन को छोड़कर तुरंत परमात्मा के घर में प्रवेश किया। ये चंचलता का सदुपयोग रहा।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि हमारे पास भी सब साधन है। रोज स्नात्र पूजा कर हम भी दिगकुमारियों के जैसे बन सकते हैं। बस आवश्यकता एक कदम उठाने की है। बाहर से द्रव्य साधना व भीतर से भाव साधना करना है। भाव साधना कर हम अपने भीतर के वातावरण को साफ करेंगे। द्रव्य साधना करेंगे तो भूमि साफ करेंगे। इसमें देव,गुरु व शास्त्र की प्रतिष्ठा कर सके। बाहर पुष्प वर्षा करेंगे तो भीतर में पुष्प जैसे हृदय को कमल बनाएंगे।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि धर्म से पहले संपर्क होता है। उससे सद्ज्ञान मिलता है। दिगकुमारियों ने परमात्मा के साथ संपर्क किया। परमात्मा में सहजता व सरलता को देखने का प्रयास किया। परमात्मा से संबंध कभी टूटे नहीं यह संकल्प लिया। तीर्थंकर के बल और ज्ञान पर कभी अविश्वास नहीं करना चाहिए। तीर्थंकर के प्रतिष्ठित धर्म पर अविश्वास नहीं करना चाहिए। कभी-कभी हमें संदेह होता है यह मोक्ष होता है ? यह स्वर्ग और नरक होता है कि नहीं ? जान लें, स्वाध्याय से जितना जानना है। जानने के बाद पूर्ण विश्वास होना चाहिए। आधे अधूरे विश्वास के साथ परमात्मा नहीं मिल सकते। अहंकार छोड़ना पड़ेगा।
धर्मसभा में 29 उपवास के तपस्वी का संघ ने किया सम्मान
चातुर्मास समिति के अध्यक्ष श्यामसुंदर बैदमुथा ने बताया कि धर्मसभा में 29 उपवास के तपस्वी मनोज लोढ़ा का संघ ने सम्मान किया। तपस्वी का ये 18वां मासक्षमण है। उपाध्याय भगवंत को बारसासूत्र बोहराने का लाभ निर्मला देवी, धर्मचंद, राजेश,अशोक,मुकेश संजय,यश निमानी परिवार ने लिया। बारसासूत्र का लाभार्थी परिवार पूरे संघ को परमात्मा के सम्पूर्ण चित्र दर्शन करवाएगा। प्रथम ज्ञान पूजा की लाभ निर्मल, निलेश कोटेचा परिवार भोपाल, द्वितीय ज्ञान पूजा का लाभ गौतमचंद, निलेश बोथरा रायपुर, तृतीय ज्ञान पूजा का लाभ मोहनलाल, मदनचंद,महावीर पारख परिवार रायपुर,चतुर्थ ज्ञान पूजा का लाभ विमला देवी, मिलापचंद,संतोष,गौरव गोलछा परिवार एवं पंचम ज्ञान पूजा का लाभ राजेंद्र कुमार,संयम झाबक परिवार टैगोर नगर को मिला।
