बाटला हाउस के एल-18 में आज भी सन्नाटा पसरा हुआ था। गली में चहल-पहल तो जरूर थी, लेकिन मीडिया कर्मियों को देखकर लोग कन्नी काटने में ही अपनी बेहतरी समझ रहे थे। हम एल-18 वाली बिल्डिंग में दाखिल हुए और वहां अलग-अलग फ्लैट में रहने वाले लोगों का दरवाजा खटखटाया। मीडिया का नाम सुनते ही लोगों ने बिना बात किए अपने-अपने दरवाजे बंद कर लिये। बिल्डिंग के बराबर में सैलून चलाने वाले युवक ने बताया कि पिछले एक सप्ताह से लगातार कोई न कोई मीडियाकर्मी यहां पहुंच रहा है। मीडिया अब के हालात के बारे में पूछते हैं, यहां तो हालात जैसे पहले थे, वैसे अब हैं। ज्यादातर लोग मसले पर बात करने के लिए तैयार नहीं थे। मिन्नतें करने पर पड़ोस के कुछ बुजुर्ग बातचीत करने के लिए तैयार हुए। उन्होंने बताया कि पुलिस ने अपना काम किया, बिना सबूत के तो पुलिस यहां पहुंची नहीं होगी। अब हमें अदालत पर पूरा भरोसा है। बुजुर्गों का कहना था कि बटला एनकाउंटर के बाद पूरे ही इलाके पर ऐसा दाग लगा कि वह आज नहीं धुल पाया है।
एल-18 के पीछे वाली गली में रहने वाले जाकिर आज भी उस दिन को याद करके घबरा रहे थे। 19 सितंबर 2008 की सुबह वह अपने घर पर ही मौजूद थे। अचानक तेज पटाखों जैसी आवाजें आने लगी तो लोग बाहर निकले। लोगों ने देखा कि एल-18 की चौथी मंजिल पर कुछ लोग मौजूद थे। चंद ही मिनटों में पता चल गया था कि पुलिस बिल्डिंग में एनकाउंटर कर रही है। जाकिर ने बताया कि देखते ही देखते लोगों की भारी भीड़ मौके पर इकट्ठा हो गई। जाकिर ने बताया कि उनको बाद में पता चला था कि बिल्डिंग में इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) के पांच आतंकी छिपे हैं। कुछ देर बाद गोलियां चलने की आवाजें तो थम गई थी, लेकिन पुलिस ने पूरे इलाके को घेर लिया था। मीडिया कर्मियों का भी जमावड़ा लग चुका था।
हाजी इस्माइल ने बताया कि घटना के कई महीनों बाद तक लोगों में दहशत रही। काफी दिनों तक गली में पुलिस की मौजूदगी रही। इसके अलावा उस फ्लैट को सील कर दिया गया। कभी-कभार जांच के लिए उसे खोला जाता था, बाद में दोबारा सील कर दिया जाता था। आज तक एल-18 की चौथी मंजिल (बैक साइड) का वह फ्लैट बंद है।
पास में ही रहने वाले कुछ लोगों ने एनकाउंटर पर सवाल खड़े करते हुए उसे संदिग्ध भी बताया, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या इक्का-दुक्का ही थी। पड़ोस में रहने वाले सर्वोदय विद्यालय के एक शिक्षक ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि जो होना था वह हुआ। घटना पर राजनीतिक रोटिया सेकने वालों ने खूब मजा लिये। आज भी पूरा इलाका उस घटना के नाम से बदनाम है। हालात यह है कि दिल्ली के दूसरे इलाकों में खड़े होकर ऑटो या टेक्सी वाले जामिया नगर या बाटला हाउस का नाम सुनकर इधर आने से मना कर देते हैं। जिसने गुनाह किया, उनको सजा मिली, अब कोर्ट उनका इंसाफ करेगा। लेकिन इलाके पर जो दाग लगे आज भी वह धुल नहीं पाए हैं।
बता दें कि 19 सितंबर 2008 को सूचना मिलने के बाद स्पेशल सेल की टीम ने बाटला हाउस के एल-18 स्थित एक फ्लैट में छिपे दो आतंकियों आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद को मार गिराया था। वहीं घटना के बाद मोहम्मद सैफ और आरिज खान भाग गए थे। पुलिस ने जीशान नामक आतंकी को मौके से पकड़ लिया था। मुठभड़े में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा आतंकियों की गोली लगने से शहीद हो गए थे।
