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राजनांदगांव : रामकथा सुंदर करतारी..!

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  • शंकर मुनि राय

राजनांदगांव | रामकाव्य परम्परा में श्रीराम का नामोल्लेख कई रूपों में मिलता है. सामान्य मनुष्य से लेकर राजकुमार, राजा और फिर विश्व अणु अर्थात विष्णु के अवतार के रूप में भी चित्रित हैं श्रीराम. राम चाहे वाल्मीकि के हों या तुलसी के, दोनों के वर्णन में श्रीराम लौकिक और अलौकिक पुरुष के रूप में चित्रित है. श्रीराम का जन्म दुनिया के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण प्रसंग है. यह इसलिए कि वे परमब्रह्म परमेश्वर, अनंत अविनाशी नारायण के अवतार हैं. इस प्रकार श्रीराम की चर्चा नर से नारायण तक की चर्चा है.

लोकभाषा में कहा जाये तो कहना है कि रामकथा सुनने से जीवन पवित्र होता है. जैसे कोई किसान पक्षियों से अपनी फसल की रक्षा के लिए तालियां बजा कर उन्हें दूर भगाता है, वैसे ही राम की कथा से मनुष्य जीवन की दुविधाएं दूर हो जाती हैं. परम संत गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं-

रामकथा सुंदर करतारी l

संसय विहग उड़ावन हारी ll

श्रीराम का जन्म इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उनके अवतरण के लिए राजा दसरथ और माता कौशल्या  ने पूर्व जनम में तपस्या की है. उनके पूर्व जन्म का ही प्रताप है कि नारायण को आज अवधपुरी में दशरथनन्दन के रूप में अवतरित होना है. यहाँ एक बात और ध्यान देने की है कि श्रीराम के रूप में विष्णु का यह अवतार स्वेच्छा से जग कल्याण के लिए हुआ है. श्रीराम सिर्फ दशरथ और कौशल्या के लिए नहीं, बल्कि-

विप्र, धेनु, सुरसंत हित लीन्ह  मनुज अवतार l निज इच्छा निर्मित तनु, मयागुन गो पार ll

अर्थात भगवान विष्णु  ब्राह्मण, धेनु, और संतों के कल्याण के लिए श्रीराम रूप में स्वेच्छा से अवतार धारण कर रहे हैं. यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि वे माया और उसके तीनों गुण-सत,रज,तम और बाहरी-भीतरी इन्द्रियों से परे हैं. उनका दिव्य शरीर अपनी इच्छा से ही बना है. मतलब किसी कर्मबन्धन से परबश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थ के द्वारा नहीं. यही कारण है कि जब ‘भये प्रकट कृपाला, दीनदयाल कौशल्या हितकारी’, तब माता कौशल्या को अपने पूर्व जन्म की तपस्या याद आ जाती है, और वे मातृत्व भाव से अभिभूत होकर दोनों हाथ जोड़कर कहने लगती हैं कि हे अनंत! मैं किस प्रकार तुम्हारी स्तुति करूँ!

माता कौशल्या की मातृत्व माया देखकर प्रभु श्रीराम हंसने लगते हैं. नवजात श्रीराम के विहँसते रूप को देखकर कौशल्या चिंतित हो जाती हैं कि मैंने तो गोद में खेलाने के लिए वरदान में आपको माँगा था! इसलिए ‘कही कथा सुनाई,मातु बुझाई, जेहि प्रकार सुतप्रेम लहै. फिर आगे कहती हैं कि आप यह रूप त्याग कर बाललीला कीजिये, ताकि मैं अपने मातृत्व को धन्य मान सकूँ. श्रीराम जन्म का यह प्रसंग यह बताता है कि भारतीय संस्कृति में माँ से बड़ा और कोई नहीं है, चाहे वह ईश्वर ही क्यों न हो. यही कारण है कि माता कौशल्या की बातें सुनने के बाद देवताओं के सुजान बालक रूप श्रीराम रोना शुरू कर देते हैं-

सुनी बचन सुजाना, रोदन ठाना, होइ बालक सुरभूपा l

यह चरित जो गावहिं , हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा लल

श्रीराम के नामकरण के समय कुलगुरु बशिष्ठ कहते है कि-

जो आनंद सिंधु सुखरासी  l

सीकर तें त्रैलोक सुपासी ll

जो सुखधाम राम अस नामा l

अखिल लोक दायक बिश्रामा ll अर्थात जो आनंद के समुद्र और सुख की राशि हैं, जिस आनंद सिंधु के एक कण से तीनो लोक सुखी होते हैं, उस पावन पुत्र का नाम ‘राम’ है, जो सुख का सदन और सम्पूर्ण लोकों को शांति प्रदान करने वाला है. श्रीराम के बाललीला में राम का नर और नारायण दोनों रूप चित्रित हैं. राजा दशरथ की इच्छा है कि बालक श्रीराम को अपनी गोद में लेकर भोजन कराने का सुख प्राप्त करते. इसलिए जब बालक श्रीराम को दूर से आवाज देते हैं, तब राम ‘नहीं आवत तजि बाल समाजा.’ फिर माता कौशल्या जब उन्हें बुलाती हैं तब भी ‘ठुमकी-ठुमकी प्रभु चलहिं पराई.’ जब कोई बालक मां के बुलाने पर भी गोद में नहीं आये तो मां का मातृत्व कमजोर साबित होता है. तब गोस्वामी जी लिखते हैं-

निगम नेति सिव अंत न पावा l ताहि धरीं जननी हठी धावा ll

धूसर धूरि भरे तनु आये l भूपति बिहँसि गोद बैठाये ll

अर्थात जिस प्रभु नारायण के बारे में वेद न-इति, न-इति अर्थात इसका अंत नहीं हैं कहते हैं, भगवान शिव जिनका अंत नहीं पाये हैं, उसी नारायण के बालरूप श्रीराम को, जो धूल में खेल रहे हैं  माता कौशल्या हठपूर्वक पकड़कर लाती हैं और राजा की गोद में पटक देती हैं. यही है भारतीय माता का महनीय रूप, जहाँ ईश्वरत्व भी चुप हो जाता हैं.

 बालक श्रीराम अपने भाइयों के साथ गुरुकुल में अध्ययन करने जाते हैं, लेकिन उन्हें सबकुछ पढ़ लेने में देर नहीं लगती है. यहां भी उनका लौकिक और अलौकिक दोनों रूप वर्णित हैं-“गुरुगृह गए पढ़न रघुराई l  अल्पकाल विद्या सब पाई ll ” धनुष यज्ञ के प्रसंग में किसी को विश्वास नहीं होता कि अब कोई भगवान  शिव के धनुष को तोड़ पायेगा. सभी निराश हैं, तभी श्रीराम मंच पर चढ़ते हैं और धनुष को ‘अति लाघव उठाई धनु लीन्हा.’ धनुष टूटने की आवाज तीनों लोकों में पहुँचती हैं. तब नारायण के अन्य अवतार परशुराम को भ्रम होता है. वे वहां पहुँचते है और पहले तो श्रीराम के साथ विवाद करते है, फिर अपना भ्रम दूर करने के लिए विनम्र भाव से श्रीराम से कहते हैं-

राम रमापति कर धनु लेहू l खैंचत बाण मिटे  संदेहू ll  फिर जैसे ही श्रीराम परशुराम के धनुष का चाप चढ़ाते है, परशुराम को विश्वास हो जाता है कि श्रीरामावतार हो गया है.

वनगमन के प्रसंग में श्रीराम का नर रूप तब दिखाई पड़ता हैं, जब वे गंगा पार उतरने के लिए केवट से नाव मांग कर रहे हैं, और केवट है कि पांव पखारे बिना अपनी नाव में उन्हें बैठने को राजी नहीं हो रहा है. नर रूप में श्रीराम केवट से विनती कर रहे है कि हमें देर हो रही हैं भाई, पर केवट का भी अपना लोक धर्म है, वह उस पर अड़ा हुआ है. तब तुलसीदास श्रीराम का नारायण रूप स्पष्ट करते हुए लिखते है-

जासु नाम सुमिरत एक बारा l उतरहीं नर भवसिंधु अपारा ll

सोइ कृपाल केवट ही निहोरा l किये तिहुँ जग जेहि पग ते थोरा ll

श्रीराम के इस नर और नारायण दोनों रूपों को समझने के बाद ही श्रीराम के रामत्व को समझा जा सकता है, जय श्रीराम!

विभागाध्यक्ष-हिंदी

शासकीय दिग्विजय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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