भिलाई. बसंत ऋतु को यूं ही ऋतुओं का राजा नहीं माना जाता है। यह वह समय है जब न तो पूरा ठंड होता है न ही गर्मी सूर्यदेव भी मध्यम दूरी पर विराजमान होकर हरियाली से सराबोर, नीले आसमान की ओढ़नी डाले धरती के सौंदर्य को अपलक निहार रहे होते हैं। बारिश से नहाकर निकली वसुंधरा, सूर्य के इस छेड़खानी वाली दृष्टि से लजाकर किसी नवयौवना की तरह श्रृंगारित होकर अंगड़ाई ले उठती है। उसके इस रूप पर पेड़ो के पत्ते भी राहों में न्यौछावर हो जाते हैं कि चलते वक्त इस सर्वांगसुंदरी के पैर न छिल जाएं। भौंरे के गुंजन और उनके छूअन से कलियों के गाल सुर्ख लाल हो उठते हैं और तनबदन में सिहरन सी दौड़ जाने पर वे फूल बन जाती हैं। कोयल की कूहू कूहू, पंछियों के कलरव और मौहा के मदमस्त खुश्बू से पूरा वातावरण सुगंधित हो उठता है। इस खुशनुमा माहौल में आम भी बौरा जाता है तो चराचर में व्याप्त प्रेमी जोड़े भी मिलन को अधीर हो उठते हैं। तभी इस मदमास में पड़ने वाले त्योहार होली के खुमार में सब बौरा जाते हैं। ऐसे ऋतु में कौन कवि चुप रह सकेगा और कौन चित्रकार अपने आप को रोक पाएगा। अंचल के प्रख्यात मॉडर्न आर्ट चित्रकार डी.एस.विद्यार्थी ने इस ऋतु में मां सरस्वती की नयनाभिराम और गूढ़ रहस्य से परीपूर्ण एक पेन्टिंग का निर्माण किया है जो उसके भावार्थ को समझने पर मजबूर कर देती है।
पौराणिक आख्यानो में वर्णन है कि एक बार मां सरस्वती भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य सौंदर्य को देखकर मोहित हो उठती हैं। वह उनके भक्ति और प्रेम में ऐसे डूब जाती हैं कि उनका रोम रोम कृष्णमय हो उठता है। जिससे उसका शरीर भी काला पड़ जाता है। यही नहीं वे अपने सिर पर मोर मुकुट भी धारण करने लग जाती हैं। इसे भारतीय अध्यात्म में प्रेम की चरम अवस्था मानी जाती है जब मन के साथ साथ शरीर भी प्रेमी में एकमेव हो जाता है। ऐसा ही उदाहरण स्वामी विवेकानंद के गुरू रामकृष्ण परमहंस के लिए भी देखा गया था जब वे मां काली के परमानंद में सशरीर डूब गए थे। चित्रकार डी.एस.विद्यार्थी ने चित्र का रहस्योद्घाटन करते हुए जानकारी दी है कि मां सरस्वती के इस प्रेम से कृष्ण इतने अभिभूत हुए कि उन्होंने मां सरस्वती की पूजा करनी शुरू कर दी। यही नहीं उन्होंने वरदान दिया कि मां सरस्वती की तरह जो भी पूरे तन मन से साधना करेगा, आसक्ति में डूबेगा उसे समस्त ज्ञान की प्राप्ति हो जाएगी। वह कला समर्पण और विद्या की अथाह ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकेगा। कालान्तर में तभी से बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है। और समस्त कलाकार, ऋषि, मुनि, कवि व ज्ञान के पिपासु मां सरस्वती की अराधना में पूरे मनोयोग से लग जाते हैं। इसी मदमास में कामदेव ने भगवान् शंकर जी को भी काम रूपी तीर मारा था। चित्र में विद्यार्थी ने अपने चिरपरिचित शोख-चटख रंगों का उपयोग करते हुए बसंत ऋतु की तरह ही रंग बिरंगे कलर को साधकर कलाकृति से पूरा न्याय किया है। उनके द्वारा निरंतर श्रेष्ठतम कला साधना की अभिव्यक्ति पर छत्तीसगढ़ी कलाजगत के सुप्रसिद्ध चित्रकार बी.एल.सोनी, आचार्य महेश चंद्र शर्मा, विभाष उपाध्याय, पी.वाल्सन, विजय शर्मा, रोहिणी पाटणकर, राष्ट्रपति पुरस्कृत गुरुजी परसराम साहू, वीरेन्द्र पटनायक, अमेरिका से कमलेश सक्सेना, मोहन बराल, ब्रजेश तिवारी, खैरागढ़ विश्वविद्यालय से प्रोफेसर कपिल वर्मा, एस.राजू, नंदकिशोर, प्रवीण कालमेघ, मीना देवांगन, उमाकांत ठाकुर, पी.एल.जेना, साहित्यकार मेनका वर्मा, बोरकर जी और ललित कला अकादमी में राज्य से प्रथम बोर्ड मेम्बर डॉ.अंकुश देवांगन ने बधाई दी है।






