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रायपुर में लगता है कलाकारों का बाजार, कोविड की वजह से पहली बार इनकी कम टोलियां पहुंची, 600 साल पुराना है इतिहास

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रायपुर- शहर में कोविड के इस काल में त्योहारों पर भी असर पड़ा। दीवाली की रौनक पिछले साल के मुकाबले कम नजर आई। शहर के पुरानी बस्ती के इलाके में एक अनोखा बाजार सजता है जो हर साल सिर्फ दीवाली के मौके पर ही लगता है। इस बाजार में फुल, मिठाई, दीये नहीं कलाकारों का सौदा होता है। यह कलाकार पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ यहां आते हैं। आस-पास के ग्रामीण इन्हें सौदा तय कर अपने साथ अपने इलाकों में ले जाकर दीवाली का जश्न मनाते हैं। यह कलाकार पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाते हैं और ग्रामीण नाचते-झुमते अपनी खुशियां जाहिर करते हैं।

रायपुर के बूढ़ा तालाब के सामने बड़े से पेड़ के नीचे इन कलाकरों की टोलियां जमा होती थीं। हर साल यहां 20 से 25 टोलियों में वाद्य कलाकार आते थे। हर टोली में 10 के करीब लोग होते थे। मगर दीवाली सुबह यहां सिर्फ तीन-चार टोलियां ही दिखीं। यहां इन टोलियों का सौदा करने आए कुलेश्वर यादव ने बताया कि कोरोना की वजह से असर पड़ा है। कलाकार नहीं आए और दाम भी बढ़ गए हैं। पिछली बार 20 से 25 हजार में बात पक्की हो जाती थी, अब तो 45 हजार से बात शुरू हो रही है। ओडिशा के बलांगीर से आए कलाकार बुधु तांडी ने बताया कि इस बार उतनी डिमांड नहीं है इसलिए कलाकार कम आए।

छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति के जानकार डॉ रमेंद्र नाथ मिश्र ने बताया कि कल्चूरी राजाओं के वक्त से गड़वा बाजा की टोलिंया रायपुर में जमा हो रही हैं। लगभग 600 साल पुराना इनका इतिहास है। बूढ़ातालाब के पास ही राजा का किला हुआ करता था, जहां इन दिनों मजार है। राजा का किला होने की वजह से वाद्य कलाकार इसी मुख्य स्थल पर जमा हुआ करते थे। यहां आने वाले ज्यादातर कलाकार ओडिशा के होते हैं। 90 के दशक में तो सप्ताह भर पहले से यहां वाद्य कलाकारों का बाजार लगता था। सड़कें जाम हो जाया करती थीं। यह कलाकार मोहरी, धापड़ा, लिंसा, चमथा जैसे पारंपरिक बाजों की प्रस्तुति देते हैं।

दीवाली के बाद गौरा-गौरी पूजा और गोवर्धन पूजा करने वाले इन्हें अपने साथ ले जाते हैं। इन वाद्य यंत्रों के बीच ही यह आयोजन होते हैं। इसके बाद पखवाड़े भर यादव समाज का राउत नाचा (लोक नृत्य) होता है। यादव समाज के लोग इन्हीं वाद्य यंत्रों के साथ गांव की हर गली में घूमकर दोहे कहते हुए नाचते हैं। शहरों में उन घरों में भी इसी अंदाज में जाते हैं, जहां साल भर दूध देते हैं। सिर पर पगड़ी हाथ में लाठी और रंग- बिरंगे कपड़े पहन कर पुरुष डांस करते हैं। कुछ पुरुष ही इसमें महिला बनकर नाचते हैं। खुशियों का उन्मुक्त होकर प्रदर्शन करते हैं।

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